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Monday, 26 October 2020

बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस लिब्रहान को जो दिखा वो सीबीआई कोर्ट न देख पाई?

From : BBC Hindi.
------------------ --------------------- छह दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस कुछ अराजक तत्वों के अचानक हमले का नतीजा था या सुनियोजित और संगठित प्रयास का परिणाम? इतिहास में यह सवाल हमेशा पूछा जाएगा. वेदों में कहा गया है कि सत्य का मुख सोने के पात्र से ढका हुआ होता है. सत्य की खोज श्रमसाध्य और अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है. सत्य अलग-अलग कोण से अलग दिखता है और देखने वाले की नज़र से भी. मैं, बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि प्रकरण में एक दर्शक रहा हूँ. चालीस साल तो प्रत्यक्ष और उसके पहले की घटनाओं को फ़ाइलों और किताबों के ज़रिए जाना-समझा है. वास्तव में यह कहानी दिसम्बर 1949 से शुरू होती है, जब रात में पुलिस के पहरे के बीच मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियाँ प्रकट हुईं या जैसा कि पुलिस रिपोर्ट में है कि "चोरी से रखकर मस्जिद को अपवित्र कर दिया गया." जवाब में कल्याण सिंह ने 31 जुलाई को पत्र लिखकर कहा कि ज़रूरी कार्यवाही हो रही है. इसके बाद कल्याण सरकार ने वहाँ मस्जिद के सामने ज़मीन और कई मंदिरों का अधिग्रहण कर हाइवे से चौड़ी सड़क बनवायी. साथ ही कांग्रेस सरकार ने बगल में राम कथा पार्क के लिए अधिग्रहीत 42 एकड़ ज़मीन विश्वहिंदू परिषद को दे दी. देश भर से आए कार सेवकों को छह दिसम्बर को तम्बू कनात लगाकर यहीं टिकाया गया. यहीं पर लाठी डंडों से लैस कारसेवकों ने पाँच दिसम्बर को रस्सियों, कुदाल और फावड़े लेकर टीले पर मस्जिद गिराने का रिहर्सल किया. इस तरह सीबीआई के मुताबिक़ बाबरी मस्जिद को गिराने का यह लम्बे समय से चला आ रहा सुनियोजित षड्यंत्र था. जिसमें संघ परिवार के विभिन्न संगठनों के अलावा शिव सेना के बड़े नेता शामिल थे. सीबीआई ने अपनी चार्जशीट पांच अक्तूबर 1993 को पेश कर दी. स्पेशल सेशंस कोर्ट ने क्या नोट किया? अयोध्या प्रकरण के लिए गठित स्पेशल सेशंस कोर्ट के जज जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव ने नौ सितम्बर 1997 को अभियुक्तों के ख़िलाफ़ चार्ज फ़्रेम किए. जज ने अपने आदेश में रिकार्ड किया, "पाँच दिसम्बर को विनय कटियार के निवास पर गुप्त बैठक हुई जिसमें आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार और पवन पांडेय ने हिस्सा लिया और उसमें विवादित ढाँचे को गिराने का निर्णय लिया गया." इसी आदेश के अनुसार, "केंद्रीय पैरामिलिट्री फ़ोर्स की 195 कम्पनियां फ़ैज़ाबाद में केंद्रीय सरकार की तरफ़ से राज्य सरकार की क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भेजी गई लेकिन उनका भारतीय जनता पार्टी सरकार ने इस्तेमाल नहीं किया. जबकि पांच दिसंबर 1992 को राज्य के गृह सचिव ने केंद्रीय बल के प्रयोग के लिए सुझाव दिया था लेकिन कल्याण सिंह इससे सहमत नहीं हुए." अभियुक्तों ने आरोप तय करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीज़न याचिका दाखिल की. यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि छह दिसम्बर को बाबरी मस्जिद ढहने के बाद अयोध्या में पुलिस ने दो मुक़दमे दर्ज किए थे. एक, लाखों अज्ञात कारसेवकों के ख़िलाफ़ मस्जिद तोड़ने के षड्यंत्र, बलवा, लूटपाट जैसे कई अपराधों के लिए और दूसरा धार्मिक उन्माद और कारसेवकों को भड़काने वाले भाषण देने के लिए. इसके अलावा 47 और मुक़दमे पत्रकारों पर हमले से संबंधित दर्ज हुए. सीबीआई ने इन सबकी एक संयुक्त चार्जशीट दाखिल की थी. सीबीआई के मुताबिक़ एक अक्तूबर 1990 को रथयात्रा के बाद सारी सभाएँ, भाषण और छह दिसम्बर को हुई समस्त घटनाएँ आपस में जुड़ी हैं और एक ही षड्यंत्र का हिस्सा हैं. स्पेशल कोर्ट ने इसी संयुक्त चार्जशीट के आधार पर आरोप निर्धारित किए थे. भड़काऊ भाषण वाले मामले में आडवाणी समेत आठों अभियुक्त पहले ही गिरफ़्तार हो गए थे. इन लोगों को ललितपुर के माताटीला बांध गेस्ट हाउस में रखा गया था. ललितपुर में स्पेशल कोर्ट बनाकर मुक़दमा शुरू हुआ था. बाद में यह केस रायबरेली ट्रांसफ़र हो गया. सीबीआई ने कोर्ट से अनुमति लेकर इस केस को भी अन्य मामलों के साथ जोड़ लिया था. राज्य सरकार ने केसलखनऊ स्पेशल कोर्ट को भेजा राज्य सरकार ने हाई कोर्ट से परामर्श किए बिना लखनऊ की स्पेशल कोर्ट की अधिसूचना संशोधित कर इस मामले को भी अयोध्या प्रकरण वाली लखनऊ की स्पेशल कोर्ट को दे दिया था. सभी बड़े नेता इस केस में अलग से नामज़द थे और क्रिमिनल रिवीज़न का यही मुख्य बिंदु था कि यह संशोधन ग़ैर-क़ानूनी था. जस्टिस जगदीश चंद्र भल्ला ने क़रीब चार साल बाद 12 फ़रवरी 2001 को अपने फ़ैसले में कहा कि निचली अदालत ने संयुक्त चार्जशीट के आधार पर आरोप तय करने में कोई ग़ैर-क़ानूनी काम नहीं किया, क्योंकि 'सभी आपराधिक घटनाएँ एक ही षड्यंत्र को पूरा करने के लिए की गई थीं.' हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पहली नज़र में एक षड्यंत्र और एक समान उद्देश्य के लिए ग़ैर-क़ानूनी जमावड़े का मामला बनता है. चूँकि यह सब कथित अपराध एक ही कृत्य के सिलसिले में घटित थे इसलिए स्पेशल कोर्ट ने इनका संज्ञान लेकर सही किया. लेकिन जस्टिस भल्ला ने कहा कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से परामर्श किए बिना क्राइम नम्बर 198 यानी भड़काऊ भाषण वाले मामले को भी लखनऊ की स्पेशल कोर्ट को भेजने की जो अधिसूचना जारी की है वह त्रुटिपूर्ण है. कोर्ट ने कहा कि यह त्रुटि दूर करने लायक़ है और राज्य सरकार चाहे तो ऐसा कर सकती है. सीबीआई ने भारतीय जनता पार्टी की राजनाथ सिंह सरकार से त्रुटि दूर करने को लिखा लेकिन वहाँ से यह बात नामंज़ूर हो गई. राजनाथ सिंह के बाद मुलायम सिंह और मायावती सरकारों ने भी त्रुटि दूर करने से मना कर दिया. मोहम्मद असलम भूरे हाईकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गए पर उनकी याचिका रद्द हो गई. लखनऊ स्पेशल कोर्ट के जज ने एक कदम आगे जाकर चार मई 2001 को भड़काऊ भाषण देने वाले केस के आठ बड़े अभियुक्तों के साथ-साथ कल्याण सिंह समेत तेरह अन्य प्रभावशाली अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मामला ख़त्म कर दिया. आडवाणी पर चल रहा आपराधिक षड्यंत्र का मामला हटा इसके बाद ही इस केस का ट्रायल लखनऊ और रायबरेली दो जगह चलने लगा. आडवाणी वग़ैरह आठ बड़े लोगों के ख़िलाफ़ मामला रायबरेली में चल रहा था लेकिन कल्याण सिंह समेत 13 लोगों के ख़िलाफ़ कहीं नहीं. रायबरेली कोर्ट ने अकेले आडवाणी को बरी या डिस्चार्ज भी कर दिया. जोशी और अन्य बाक़ी लोगों की अपील पर हाईकोर्ट ने आडवाणी समेत आठों लोगों पर मुक़दमा चलाने को कहा. इस तरह आडवाणी आदि पर मस्जिद तोड़ने के आपराधिक षड्यंत्र का मामला ड्रॉप हो गया और केवल भड़काऊ भाषण का मामला बचा. जस्टिस भल्ला के आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट में अपील 29 नवंबर 2002 और 12 फरवरी 2008 को ख़ारिज हो गई. उधर सीबीआई के लखनऊ स्पेशल कोर्ट के जज ने चार मई 2001 को 21 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मामला ड्रॉप करने के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में रिवीज़न दाखिल किया. दस साल बाद 22 मई 2001 को हाईकोर्ट ने इसे ख़ारिज कर दिया. इस आदेश के ख़िलाफ़ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट गई. सात साल बाद 19 अप्रैल 2017 को जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष और जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच ने अपने जजमेंट में उल्लेख किया कि जस्टिस भल्ला ने संयुक्त चार्जशीट और ट्रायल को वैध ठहराया था जिसमें मस्जिद गिराने का षड्यंत्र शामिल था. कोर्ट ने आगे आदेश दिया कि रायबरेली में चल रहा मुक़दमा लखनऊ की स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफ़र हो जाएगा. लखनऊ की स्पेशल सेशंस कोर्ट आडवाणी वग़ैरह के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 120 (बी) के तहत अतिरिक्त चार्ज फ़्रेम करेगी. इस तरह क़रीब 23 साल बाद लखनऊ में फिर से संयुक्त ट्रायल शुरू हुआ. यह सारी देरी इसलिए हुई कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने रिवीज़न और अपील पर फ़ैसला देने में सालों लगा दिए. 1994 में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इससे पहले एम इस्माइल फ़ारूक़ी ने अयोध्या में नरसिम्हा राव सरकार के भूमि अधिग्रहण को चुनौती दी थी. चीफ़ जस्टिस जेएस वर्मा की बेंच ने भूमि अधिग्रहण क़ानून को वैध ठहराते हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस को "राष्ट्रीय शर्म" करार दिया था. कोर्ट ने कहा था, "दोपहर के आसपास बीजेपी, वीएचपी आदि के नेता राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद इमारत के ऊपर चढ़ गए और गुम्बदों को क्षतिग्रस्त करना शुरू कर दिया. वास्तव में यह राष्ट्रीय शर्म का कृत्य था. जिसका विध्वंस हुआ वह केवल एक पुरानी इमारत नहीं थी, बल्कि बहुसंख्यक द्वारा न्याय और निष्पक्षता पर भरोसा ( टूटा) था." 2019 में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पिछले साल अयोध्या भूमि विवाद में विवादित ज़मीन हिन्दुओं के पक्ष में देते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद तोड़ने पर कड़ी टिप्पणी की थी. कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय का प्रार्थना स्थल ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से तोड़ा गया था. कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय को मस्जिद की इमारत से जिस तरह वंचित किया गया था वैसा तरीक़ा विधि के शासन से प्रतिबद्ध एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में नहीं अपनाया जाना चाहिए था. कोर्ट ने याद दिलाया था कि संविधान में सभी धर्मों को समान मानने की व्यवस्था है. सहिष्णुता और सह-अस्तित्व से हमारे राष्ट्र और इसके लोगों का पोषण होता है. लिब्रहान जाँच आयोग को षड्यंत्र के सबूत मिले केंद्र सरकार ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए जस्टिस एमएस लिब्रहान की अध्यक्षता में एक न्यायिक जाँच आयोग बनाया था. इस आयोग ने 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट में कहा था कि "बाबरी मस्जिद विध्वंस एक सुनियोजित घटना थी." आयोग ने भारतीय जनता पार्टी की त्रिमूर्ति - अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी समेत 68 लोगों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया था. इनमें आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल के नेता भी शामिल थे. सैकड़ों घंटों के ऑडियो-वीडियो टेप सुनने और गवाहों के बयान के बाद जस्टिस लिब्रहान की टिप्पणी थी, "एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोच सकते कि आडवाणी, वाजपेयी और जोशी को संघ परिवार के इरादों की जानकारी नहीं थी." लेकिन आयोग ने सबसे ज़्यादा दोषी तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बताया था. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इस आंदोलन को चलाने के लिए संघ परिवार को अज्ञात स्रोतों से धन मिला और इन संगठनों के खातों से भी दसियों करोड़ रुपए निकालकर छह दिसम्बर की घटना को अंजाम देने के लिए खर्च किए गए. इतने बड़े पैमाने पर धन खर्च करना इस बात का संकेत है कि आंदोलन के लिए जनमत बनाने और लोगों को संगठित करने से लेकर विध्वंस तक सब कुछ नियोजित था. आयोग के कहा था कि आरएसएस संगठन में सेना जैसा अनुशासन है और जिस तरह की व्यवस्था की गई थी उससे नहीं लगता कि यह सब केवल सांकेतिक कारसेवा के लिए था. आयोग ने कहा कि इन संगठनों के नेताओं का यह कहना सही नहीं कि कुछ उत्तेजित कारसेवकों ने यह सब अचानक किया. जिस तरह कुछ थोड़े से लोगों ने अपनी पहचान छिपाकर इतनी कम जगह में इमारत पर धावा बोला, मूर्तियों और दान पात्र को हटाया और अस्थायी मंदिर बनाकर उन्हें फिर स्थापित किया, उनके पास इमारत तोड़ने और अस्थायी मंदिर बनाने के औज़ार और संसाधन उपलब्ध थे, उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इसके लिए बड़ी मेहनत से तैयारी की गई और योजना बनायी गई. आयोग का निष्कर्ष है कि जिस काम में इतनी बड़ी संख्या में कारसेवकों की हर जगह ड्यूटी लगायी गयी, यह हो नहीं सकता कि जिनके पास सूचनाओं के अनेक स्रोत थे, उन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इसके बारे में न पता हो. ऐसा नहीं हो सकता कि तत्कालीन संघ प्रमुख केएस सुदर्शन को न पता हो या विनय कटियार और अशोक सिंघल जैसे नेताओं को न पता हो. आयोग ने कहा कि "आरएसएस और वीएचपी का यह एक सूत्री एजेंडा था. कुछ मुट्ठी भर विचारकों और धार्मिक उपदेशकों ने आम जनता के दिलो-दिमाग़ को एक ऐसी उपद्रवी भीड़ में बदल दिया जिसने हाल के समय में सबसे दुष्टता पूर्ण कार्य को अंजाम दिया." "कुछ मुट्ठी भर बुरी नीयत वाले नेताओं ने बेशर्मी के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम का इस्तेमाल कर के शांतिपूर्ण समुदायों को असहिष्णु झुंड में बदल दिया". अत्यंत कठोर शब्दों का इस्तेमाल करते हुए जस्टिस लिब्रहान ने लिखा कि "इस बात के पक्के सबूत मिले कि सत्ता और दौलत की लालच से बीजेपी, आरएसएस, वीएचपी, शिव सेना, बजरंगदल आदि में ऐसे नेता पैदा हुए जिन पर ना उनकी कोई विचारधारा और ना नैतिक मूल्यों का दबाव था". "इन नेताओं ने अयोध्या मुद्दे को अपनी सफलता के हाइवे के रूप में देखा और वह इस मार्ग पर तीव्र गति से दौड़ पड़े, बिना यह परवाह किए कि इससे रास्ते में चारों तरफ़ कितने लोग मारे जाएँगे." यह सब पढ़ने के बाद मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब लिब्रहान जाँच आयोग के पास सुनियोजित षड्यंत्र के प्रमाण आ गए थे तो वही प्रमाण और गवाह लखनऊ की स्पेशल कोर्ट के सामने भी थे तो दोनों के निष्कर्ष इतने अलग क्यों? स्पेशल कोर्ट को मस्जिद विध्वंस का न कोई षड्यंत्र दिखा, न पूर्व योजना दिखी और न ही "बाबरी मस्जिद का कलंक" मिटाने का आंदोलन चलाने वाले किसी नेता का हाथ दिखा. उल्टे कोर्ट की निगाह में वे मस्जिद को बचाने की कोशिश कर रहे थे. दरअसल, हर छोटी-बड़ी अदालत अपने निर्णय के लिए स्वतंत्र रूप से काम करती है. किसी जाँच आयोग के निष्कर्ष उस पर बाध्यकारी नहीं हैं, भले ही जाँच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने की हो. जब कोई जज क्रिमिनल ट्रायल में बैठता है तो चार्ज फ़्रेम करने में उसे पहली नज़र में मामला बनता है या नहीं, यह देखना होता है. दोष सिद्ध करने के लिए उसे सबूतों को इस कसौटी पर तौलना होता है कि किसी मुलज़िम का जुर्म असंदिग्ध रूप से प्रमाणित होता है या नहीं. शक का लाभ हमेशा मुलज़िम को मिलता है. व्यंग्यात्मक लहजे में कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि शायद मस्जिद अपना जीवनकाल समाप्त मानकर स्वयं ध्वस्त हो गयी और कुछ निर्दोष कारसेवक उसके नीचे दब गए. ऐसे में बाबरी मस्जिद को एक लीगल पर्सन मानकर उसके ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा भी चलाया जा सकता है. सोशल मीडिया पर किसी का यह शेर भी खूब शेयर हो रहा है. "क़ातिल की यह दलील मुंसिफ़ ने मान ली, मकतूल ख़ुद गिरा था ख़ंजर की नोक पर."

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