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Monday, 26 October 2020

बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस लिब्रहान को जो दिखा वो सीबीआई कोर्ट न देख पाई?

From : BBC Hindi.

Sunday, 4 October 2020

बंगाल के अकाल में 30 लाख से अधिक मौतें - 1943

From BBC Hindi..
जब मैं बच्ची थी तब मैंने पहली बार विंस्टन चर्चिल के बारे में पढ़ा था. एनिड ब्लॉयटन की एक किताब जो मैं पढ़ रही थी उसमें एक कैरेक्टर उनकी ज़बरदस्त प्रशंसक थी. वो उन्हें 'एक महान नेता मानती' थी. जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई वैसे-वैसे भारत के औपनिवेशिक इतिहास को लेकर होने वाली तमाम तरह की बातों का हिस्सा मैं बनी. मैंने पाया कि विंस्टन चर्चिल को लेकर हमारे देश में लोगों की राय अलग-अलग है. औपिनिवेशिक काल को लेकर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग मानते हैं कि अंग्रे़ज़ों ने भारत के लिए बहुत कुछ किया. इसमें रेलवे के निर्माण से लेकर डाक सेवाएं जैसे काम शामिल हैं तो कुछ मेरी दादी की तरह मानते हैं कि, "ये सब उन्होंने अपने फ़ायदे के लिए किया और भारत को ग़रीब और लूट-खसोट कर छोड़ दिया." मेरी दादी हमेशा बड़े चाव से बताती थीं कि कैसे उन्होंने 'क्रूर ब्रितानियों' के ख़िलाफ़ आंदोलन में हिस्सा लिया था. लेकिन इस आक्रोश के बावजूद लोगों में पश्चिमी चीज़ों और गोरों की कही गई बात और उनके द्वारा कुछ भी किए जाने को लेकर उनके प्रति एक उच्चता का बोध रहता था. दशकों तक रहे औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के अंतर्गत लोगों का आत्मविश्वास बिल्कुल ख़त्म हो गया था. आज़ादी के बाद के 73 सालों में बहुत कुछ बदल गया है. दुनिया में अपनी जगह को लेकर आत्मविश्वास से भरी नई पीढ़ी अब सवाल कर रही है कि क्यों 1943 के बंगाल के अकाल जैसे औपनिवेशिक इतिहास के काले अध्यायों को लेकर और विस्तार से जानकारी उपलब्ध नहीं है. इस अकाल के दौरान क़रीब तीस लाख लोग भूख से मारे गए थे. यह तादाद दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सम्राज्य के अंदर मारे गए लोगों से क़रीब छह गुना ज़्यादा है.
लेकिन हर साल युद्ध की जीत और उसमें हुए नुक़सान को तो याद किया जाता है लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ही ब्रितानी हुकूमत वाले बंगाल में हुई इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी को लगभग भुला दिया जाता है. प्रत्यक्षदर्शी उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे खेतों में लाशें पड़ी हुई थीं. नदियों में मरे हुए लोगों की लाशें तैर रही थीं और कैसे कुत्ते और गिद्ध लाशों को नोचकर खा रहे थे. इतने बड़े पैमाने पर किसी की भी न हिम्मत थी उन लाशों के अंतिम क्रिया क्रम करने की और ना ही सामर्थ्य. जो गांवों में बच गए थे, वो खाने की तलाश में क़स्बों और शहरों की ओर भाग रहे थे. बंगाल के मशहूर अभिनेता सौमित्र चटर्जी बंगाल के अकाल के वक़्त आठ साल के थे. वो बताते हैं, "हर कोई कंकाल की तरह नज़र आता था. लगता था मानो किसी ने कंकाल को चमड़ा पहना दिया है." वो बताते हैं, "लोग बेसहाय होकर रोते हुए चावल से निकलने वाला पानी (माड़) मांगते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि किसी के पास दूसरे को देने के लिए चावल नहीं है. जिस किसी ने भी वो दयनीय आवाज़ अपनी ज़िंदगी में सुनी है, वो कभी भी उस आवाज़ को भूल नहीं पाया. अभी उस दौर की बात करते हुए मेरे आंखों में आंसू आ गए हैं और मैं ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूँ." चर्चिल की कैबिनेट पर क्या हैं आरोप? 1942 में तूफ़ान और बाढ़ के आने की वजह से ये अकाल पड़ा था. लेकिन विंस्टन चर्चिल और उनकी कैबिनेट के ऊपर इसे और बदतर स्थिति में लाने का इल्ज़ाम लगाया जाता है. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की इतिहासकार यास्मीन ख़ान बताती हैं कि बर्मा से जापानियों के घुसपैठ के ख़तरे को देखते हुए 'नज़रअंदाज़ करने की नीति' अपनाई गई थी. वो बताती हैं, "इसके पीछे सोच यह थी कि फ़सल समेत सभी चीज़ों को ख़त्म कर दिया जाए. यहाँ तक कि जो नावें फ़सलों को ले जाने में इस्तेमाल होती हैं, उन्हें भी बर्बाद कर दिया जाए ताकि जापानी जब आएं तो उनके पास आगे बढ़ने के लिए कोई भी संसाधन ना हो. इसकी नीति का असर यह हुआ कि अकाल और विकराल रूप में सामने आया." ब्रितानी अधिकारियों की डायरी से पता चलता है कि चर्चिल प्रशासन भारत अनाज निर्यात करने की मांग को इस डर से खारिज कर दिया कि कहीं ब्रिटेन के भंडार में कमी ना आ जाए. चर्चिल का मानना था कि स्थानीय नेता भुखमरी को दूर करने में ज़्यादा मदद कर सकते हैं. इन बातों से तब के ब्रितानी प्रधानमंत्री के भारत के प्रति रवैये का पता चलता है. भारत के लिए नियुक्त मंत्री लियोपोल्ड एमेरी के मुताबिक़, एक बार चर्चिल ने अकाल के दौरान मदद करने को लेकर होने वाले विचार-विमर्श के दौरान कहा था कि भारत के लिए कोई भी मदद नाकाफ़ी होगी क्योंकि "भारतीय खरगोश की तरह बच्चे पैदा करते हैं."
यास्मीन ख़ान कहती हैं, "हम उन्हें अकाल के लिए किसी भी तरह से दोषी नहीं ठहरा सकते हैं लेकिन हम कह सकते हैं कि सक्षम होने के बावजूद उन्होंने राहत पहुँचाने की कोशिश नहीं की और उन्होंने गोरों की ज़िंदगी को दक्षिण एशियाई लोगों की ज़िंदगी के ऊपर तरजीह दी. यह वाकई में अन्यायपूर्ण था क्योंकि उस वक़्त लाखों भारतीय सैनिक दूसरे विश्व युद्ध में लड़ रहे थे." ब्रिटेन में कुछ लोग दावा करते हैं कि चर्चिल ने भले ही भारत के बारे में अशोभनीय टिप्पणी की होगी लेकिन उन्होंने मदद करने की कोशिश ज़रूर की थी. युद्ध की वजह से इसमें देरी हुई. सच तो यही है कि लाखों लोग उनकी नज़र के सामने खाने के लिए तरसते हुए मारे गए. उस वक़्त आर्चीबैल्ड वैवेल भारत के वायसराय थे. उन्होंने बंगाल के अकाल को ब्रितानी हुकूमत के अंदर होने वाली सबसे बड़ी त्रासदियों में बताया था. उन्होंने कहा कि इससे जो ब्रितानी साम्राज्य की छवि को जो नुकसान हुआ है, उसकी भारपाई नहीं की जा सकती. सौमित्र चटर्जी कहते हैं, "लोगों को उम्मीद है कि यह वक़्त ब्रिटिश सरकार के सामने आकर उन दिनों जो कुछ भी भारत के साथ हुआ, उसके लिए माफ़ी मांगने का है." ब्रिटेन में भी बहुत सारे लोग औपनिवेशिक काल और उस समय के नेताओं पर सवाल कर रहे हैं. पिछले महीने ब्लैक लाइव्स मैटर प्रोटेस्ट के दौरान मध्य लंदन में चर्चिल की प्रतिमा पर कालिख पोत दी गई. भारतीय इतिहासकार रुद्रांग्शु मुखर्जी कहते हैं, "मैं प्रतिमाओं को गिराने या उनको कालिख पोते जाने के पक्ष में नहीं हूँ. लेकिन मुझे लगता है कि मूर्तियों के नीचे जो विवरण प्लेट होता है, उस पर पूरा इतिहास दर्ज होना चाहिए. चर्चिल दूसरे विश्व युद्ध के नायक थे लेकिन वो 1943 में बंगाल में आए अकाल के दौरान मारे गए लाखों लोगों के लिए भी ज़िम्मेवार थे. मुझे लगता है कि यह ब्रिटेन को भारतीयों और ख़ुद के लिए भी करना चाहिए." ये भी पढ़ें: वह गुप्त मीटिंग जिसमें हिटलर को हराने की योजना बनी अतीत को वर्तमान के मापदंड पर परखने पर हमारी दुनिया में कोई नायक नहीं बचेगा. भारत की आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी पर भी कालों के ख़िलाफ़ राय रखने के आरोप हैं. लेकिन पूरा सच स्वीकार किए आगे बढ़ना भी मुश्किल है. मेरे बचपन की पसंदीदा लेखिका एनिड ब्लॉयटन की किताबों की भी नस्लवादी और सेक्सिस्ट कहकर जमकर आलोचना हुई है. आज एक व्यस्क के रूप में मैं अपने मां-बाप के घर में किसी कोने में पड़ी उन किताबों को जब देखती हूँ तो मुझे वो आरोप सही भी लगते हैं लेकिन क्या मैं उन्हें फेंक दूँ? नहीं. उससे जुड़ी जो ख़ुशनुमा यादें हैं, वो अब मैं जो जानती हूँ उससे अछूती हैं. लेकिन मैं उन किताबों को अपने परिवार में बच्चों को नहीं दूँगी. उनके पास अब कहीं अधिक बराबरी वाली दुनिया की कहानियाँ पढ़ने का अवसर है.

Tuesday, 29 September 2020

एमनेस्टी इंटरनेशल ने भारत में काम क्यों समेटा?

from BBC Hindi ... ... https://www.bbc.com/hindi/india-54336302 ... ... अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में अपना काम बंद करने की घोषणा की है. उसने ये फ़ैसला हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के संस्था के खातों को फ़्रीज़ करने के बाद किया है. ईडी ने सीबीआई की ओर से पिछले साल दर्ज एक एफ़आईआर के बाद अलग से जाँच शुरू की थी. एमनेस्टी पर विदेशी चंदा लेने के बारे में बने क़ानून एफ़सीआरए के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था. एमनेस्टी ने एक बयान में अपना काम बंद करने के लिए "सरकार की बदले की कार्रवाई" को ज़िम्मेदार बताया है. .. .. भारत सरकार ने अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. .. .. एमनेस्टी ने अपने बयान में कहा है, "10 सितंबर को एमनेस्टी इंटरनेशल इंडिया को पता चला कि ईडी ने उसके सारे बैंक खातों को फ़्रीज़ कर दिया है, जिससे मानवाधिकार संस्था के अधिकतर काम ठप हो गए हैं." ... ... उसने आगे लिखा है, "ये मानवाधिकार संगठनों के ख़िलाफ़ भारत सरकार की ओर से बेबुनियाद और ख़ास मक़सद से लगाए गए आरोपों के आधार पर चलाए जा रहे अभियान की एक ताज़ा कड़ी है." FCRA: मोदी सरकार ने छह सालों में क्या NGO के लिए एक मुश्किल दौर बनाया है? एमनेस्टी के एक वरिष्ठ अधिकारी रजत खोसला ने बीबीसी से कहा, "हम भारत में एक अभूतपूर्व परिस्थिति का सामना कर रहे हैं. हमें सरकार की ओर से एक व्यवस्थित तरीक़े से लगातार हमलों, दादागिरी और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और ये केवल इसलिए हो रहा है कि हम मानवाधिकार से जुड़े काम कर रहे हैं और सरकार हमारे उठाए सवालों का जवाब नहीं देना चाह रही है, वो चाहे दिल्ली दंगों को लेकर हमारी पड़ताल हो या जम्मू-कश्मीर में लोगों की आवाज़ों को ख़ामोश करना." सरकार पर उठाए थे सवाल एमनेस्टी ने पिछले महीने एक रिपोर्ट में कहा था कि फ़रवरी में दिल्ली में हुए दंगों में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था. दिल्ली पुलिस ने रिपोर्ट का खंडन करते हुए अख़बार द हिंदू से कहा था कि एमनेस्टी की रिपोर्ट "एकतरफ़ा, पक्षपाती और विद्वेषपूर्ण" है. इस साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म किए जाने के एक साल पूरा होने पर एमनेस्टी ने हिरासत में रखे गए सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को रिहा किए जाने और सामान्य इंटरनेट सेवा बहाल करने की माँग की थी. ... ... 2019 में एमनेस्टी ने अमरीका में विदेश मामलों की एक समिति के सामने दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों की स्थिति पर सुनवाई के दौरान कश्मीर के बारे में अपनी पड़ताल को पेश किया था. एमनेस्टी बार-बार ये कहते हुए सरकार की आलोचना करती रही है कि भारत में असंतोष का दमन किया जा रहा है. 2016 के अगस्त में, एमनेस्टी इंडिया के ख़िलाफ़ ये आरोप लगाते हुए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था कि उसके एक कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगे. तीन साल बाद, एक अदालत ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था. 2018 के अक्तूबर में एमनेस्टी के बेंगलुरू स्थित दफ़्तरों पर ईडी ने छापा मारा था. तब भी उसके खाते फ़्रीज़ कर दिए गए थे, लेकिन एमनेस्टी ने कहा कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद उसे खाते से लेन-देन की मंज़ूरी मिल गई. फिर 2019 में संस्था के अनुसार उसके दर्जनों चंदा देने वालों को इनकम टैक्स विभाग की ओर से नोटिस भेजा गया. इसी साल उसके दफ़्तरों पर फिर छापे पड़े, लेकिन इस बार ये छापे सीबीआई ने मारे. एमनेस्टी इंटरनेशनल को इससे पहले कांग्रेस की अगुआई वाली गठबंधन सरकार के कार्यकाल में भी मुश्किल हुई थी. 2009 में भी उसने भारत में अपना काम स्थगित कर दिया था. तब संस्था का कहना था कि विदेशों से चंदा लेने के लिए उसका लाइसेंस बार-बार रद्द किया जा रहा था. .. .. .. .. विदेशी चंदा भारत में पिछले कई सालों से विदेशी चंदा लेने को लेकर बने नियमों को सख़्त किया जाता रहा है और हज़ारों ग़ैर-सरकारी संगठनों पर विदेशों से चंदा लेने पर पाबंदी लगाई गई है. मौजूदा मोदी सरकार ने पहले कहा था कि एमनेस्टी के ख़िलाफ़ विदेशी चंदा लेने के क़ानून का उल्लंघन करने के संदेह में जाँच की जा रही है. एमनेस्टी के अधिकारी रजत खोसला कहते हैं, "ये सफ़ेद झूठ है. एमनेस्टी इंडिया ने सभी घरेलू और क़ानूनी शर्तों का पालन किया है." उन्होंने कहा, "ऐसे क़दमों से भारत अच्छे देशों के समूह से अलग दिखता है. हम 70 से ज़्यादा देशों में काम कर रहे हैं, और इससे पहले किसी और देश में अगर हमने काम बंद किया है तो वो 2016 में रूस में किया था. " "मुझे उम्मीद है दुनिया भर में लोग इसे ध्यान से देखेंगे. हम ये फ़ैसला बहुत ही बोझिल दिल से और क्षुब्ध और दुखी होते हुए कर रहे हैं." एमनेस्टी ने कहा है कि वो भारत में अपने मुक़दमों को लड़ना जारी रखेगी.
... .... .... ... From BBC Hindi

Thursday, 24 September 2020

कोरोना वायरस के कारण चार सांसदों और कई विधायकों की गई जान

https://www.bbc.com/hindi/india-54276634 From BBC Hindi कोरोना वायरस के कारण बुधवार को केंद्रीय रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी का एम्स में निधन हो गया. 11 सितंबर को कोरोना पॉज़िटिव रिपोर्ट आने के बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था. सुरेश अंगड़ी 65 साल के थे. भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. अब तक कोरोना वायरस के कारण गुरुवार सुबह तक 91,149 लोगों की मौत हो चुकी है और 5,732,519 लोग वायरस से संक्रमित हैं. इनमें से 9,66,382 एक्टिव मामले हैं. सुरेश अंगड़ी की तरह कोरोना वायरस ने कई जनप्रतिनिधियों की जान ली है. पूर्व राष्ट्रपति, चार सांसद और कई विधायक इसके कारण अपनी जान गंवा चुके हैं. इसमें सबसे बड़ा नाम पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का है. वो सेना के आर एंड आर अस्पताल में ब्रेन सर्जरी के लिए भर्ती हुए थे जहां वो कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए. संक्रमण के चलते उनकी हालत और बिगड़ गई और 31 अगस्त को उनकी मौत हो गई. 16 सिंतबर को आंध्र प्रदेश में तिरुपति से सांसद बल्ली दुर्गा प्रसाद की चेन्नई के अपोलो अस्पताल में कोरोना संक्रमण के चलते मौत हो गई थी. बल्ली दुर्गा प्रसाद युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी से थे. उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दुख जताया था. 64 साल के दुर्गा प्रसाद नेल्लूर में गुडुर से विधायक रह चुके थे. इसी दौरान राज्यसभा सांसद अशोक गस्ती का भी कोरोना वायरस के चलते निधन हो गया. अशोक गस्ती बीजेपी के कर्नाटक से सांसद थे. अशोक गस्ती हाल ही में राज्यसभा सांसद चुने गए थे और वह एक बार भी संसद नहीं पहुंचे थे. 55 साल के अशोक गस्ती को मल्टी ऑर्गन फ़ेलियर की दिक़्क़त हो गई थी और वो लाइफ़ सपोर्ट पर थे. इससे पहले 28 अगस्त को तमिलनाडु के कन्याकुमारी से कांग्रेस सांसद एच वसंतकुमार चल बसे थे. 70 साल के वसंतकुमार को कोरोना वायरस से संक्रमित होने के चलते 10 अगस्त को चेन्नई में भर्ती कराया गया था. इसके अलावा यूपी, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कई विधायकों की कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई है. उत्तर प्रदेश में एक महीने में ही दो मंत्रियों की जान चली गई. योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में एकमात्र महिला मंत्री कमल रानी वरुण की कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई थी. कमल रानी वरुण यूपी की तकनीकी शिक्षा मंत्री थीं. उनके बाद क्रिकेटर से नेता बने नागरिक सुरक्षा मंत्री चेतन चौहान भी कोरोना वायरस के कारण जान गंवा बैठे. चेतन चौहान को वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था क्योंकि वायरस के चलते उनकी किडनी में समस्या आ गई थी. इसी दौरन मध्य प्रदेश से कांग्रेसी विधायक गोवर्धन डांगी की 15 सितंबर को कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई थी. गोवर्धन डांगी राजगढ़ में ब्यावरा से विधायक थे. पश्चिम बंगाल में टीएमसी विधायक समरेश दास और पार्टी में उनके सहकर्मी तमोनाश घोष की भी कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई थी. पूर्वी मिदनापुर में एगरा से विधायक समरेश दास 76 साल के थे और उन्हें किडनी संबंधी दिक़्क़त हो गई थी. 60 साल के तमोनाश घोष दक्षिण 24 परगना ज़िले में फाल्टा से विधायक थे. वहीं, तमिलनाडु में डीएमके नेता जे अंबाझगन की जून में कोरोना वायरस के कारण जान चली गई थी. अंबाझगन चेपुक-तिरुवल्लीकेनी से विधायक थे. इसके अलावा लेह से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मंत्री पी नामग्याल की भी जून में मौत हो गई. वो मौत के बाद कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए थे. 83 साल के पी नामग्याल राजीव गांधी सरकार में मंत्री रहे थे. इसी महीने महाराष्ट्र के सांसद हरिभाऊ जावले भी कोरोना वायरस के कारण चल बसे. पुणे में पंढारपुर से पाँच बार विधायक रहे सुधारक परिचारक की भी अगस्त में कोरोना वायरस के कारण मृत्यु हो गई. 76 साल के सीपीआईएम नेता श्यामल चक्रबर्ती की भी कोविड-19 के चलते मौत हो गई. वह परिवहन मंत्री रह चुके हैं. गृह मंत्री अमित शाह भी कोरोना पॉज़िटिव पाए गए थे लेकिन इलाज़ के बाद वो ठीक हो गए थे. गृह मंत्री अमति शाह, केंद्रीय सड़क परिवहन एंड राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन, आप विधायक आतिशी मार्लेना और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व पीडब्ल्यू मंत्री अशोक चव्हाण भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं. लेकिन इन सभी नेताओं ने कोरोना को मात दी और स्वस्थ होकर घर लौटे. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बुधवार की रात एक बार फिर अस्पताल में भर्ती कराया गया है. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी कोरोना पॉज़िटिव हैं और उनका इलाज़ चल रहा है. इनके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को भी जून में कोरोना वायरस का संक्रमण हुआ था. हालांकि, वो कोरोना से ठीक हो गए थे लेकिन, कई और परेशानियों के चलते 13 सितंबर को उनका निधन हो गया.

Thursday, 20 August 2020

From BBC.....स्वामीनाथन नटराजन बीबीसी वर्ल्ड सर्विस....

हाथी की सूंइमेज कॉपीरइटSANGITA IYER Image caption संगीता अय्यर कहती हैं जैसे ही उन्होंने हथिनी लक्ष्मी को देखा उन्हें उससे प्यार हो गया गुजरे सात सालों से संगीता अय्यर धर्म के नाम पर हाथियों के उत्पीड़न को ख़त्म करने के मिशन पर हैं. वे बीबीसी को बताती हैं, "किस तरह के ईश्वर अपनी ही बनाई गई चीज़ के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार बर्दाश्त कर सकता है? यह बेहद परेशान करने वाला है." केरल में पैदा हुईं और अब टोरोंटो रह रहीं अय्यर डॉक्युमेंट्री बनाती हैं. वे कहती हैं कि बहुत सारे दूसरे बच्चों की तरह से ही उन्हें भी हाथी देखना अच्छा लगता था. संगीता अय्यर कहती हैं, "जब मैं छोटी थी तो मैं हाथियों की परेड देखा करती थी और मुझे वो बहुत अच्छा लगता था." बाद में उन्हें पता चला कि समारोहों में इस्तेमाल होने वाले हाथियों को कितने दर्द से गुजरना पड़ता है.

यातना देकर हाथियों को मार देते हैं

Thursday, 23 July 2020

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन का इस्लामिक राष्ट्रवाद कैसे फैलाया जा रहा है?

From BBC


तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन का इस्लामिक राष्ट्रवाद कैसे फैलाया जा रहा है?


तुर्की में इस्तांबुल के जिस हागिया सोफ़िया को राष्ट्रपति अर्दोआन ने फिर से मस्जिद बनाया, उसके ठीक सामने 1818 में सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह बिन सऊद का सिर कलम किया गया था.
उस्मानिया सल्तनत यानी ऑटोमन साम्राज्य के सैनिक किंग अब्दुल्लाह बिन सऊद और वहाबी इमाम को जंजीर में बांधकर इस्तांबुल लाए थे. जब अब्दुल्लाह का सिर काटा जा रहा था तो हागिया सोफ़िया के बाहर भीड़ जश्न मना रही थी और सिर काटे जाने के बाद पटाखे फोड़े गए थे.
हागिया सोफ़िया के बाहर अब्दुल्लाह का सिर कटा शव तीन दिनों तक लोगों के देखने के लिए रखा गया. वहाबी इमाम का सिर कलम इस्तांबुल के बाज़ार में किया गया था.
इस दौरान ऑटोमन साम्राज्य के सैनिकों ने पहले सऊदी स्टेट की राजधानी दिरिया और रियाद के बाहरी इलाक़ों पर हमला कर ध्वस्त कर दिया था. ऑटोमन साम्राज्‍य ही 1924 में सिमटकर आधुनिक तुर्की बना और आज का तुर्की ऑटोमन को अपना गौरवशाली इतिहास मानता है.
सऊदी अरब तुर्की के साथ अपने इस भयावह इतिहास को शायद ही कभी भूल पाएगा. जेएनयू में मध्य-पूर्व मामलों के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि सऊदी अरब जब अपने इतिहास में झाँकता है तो उसे ऑटोमन साम्राज्य सबसे पहले याद आता है.



वो कहते हैं, ''ऑटोमन ने सऊदी वालों को हमेशा असभ्य कबीला माना. भले सऊदी में मक्का-मदीना हैं और दोनों ऑटमन के नियंत्रण में भी रहे हैं लेकिन तुर्की का कोई सुल्तान कभी हज पर नहीं गया.''
सऊदी अरब के वर्तमान शासक 84 साल के किंग सलमान और 34 साल के क्राउन प्रिंस उसी अब्दुल्लाह बिन सऊद के खानदान से आते हैं जिनका हागिया सोफ़िया के सामने सिर कलम किया गया था. सऊदी अरब को 1932 से पहले दो बार एक देश बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन दोनों बार ऑटोमन साम्राज्य ने इसे तबाह कर दिया.
पहली बार 1818 में तबाह किया गया और दूसरी बार 1871 में. सऊदी की तीसरी कोशिश तब सफल रही जब पहले विश्व युद्ध में उसने ब्रिटेन का साथ दिया और ऑटोमन साम्राज्य को मुँह की खानी पड़ी. अब एक बार फिर से तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ऑटोमन के अतीत को ज़िंदा करने की कोशिश कर रहे हैं और हागिया सोफ़िया उसकी ताज़ा मिसाल है.
सऊदी और तुर्की दोनों सुन्नी मुस्लिम देश हैं लेकिन दोनों का इतिहास उतना ही रक्तरंजित रहा है.
1500 साल पुरानी यूनेस्को की विश्व विरासत हागिया सोफ़िया मूल रूप से मस्जिद से पहले चर्च था. आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने इसे 1930 के दशक में म्यूज़ियम बना दिया था. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पिछले साल इसे मस्जिद बनाने का चुनावी वादा किया था.



साहित्य में तुर्की के पहले नोबेल विजेता ओरहान पामुक ने हागिया सोफ़िया को मस्जिद में तब्दील करने पर कहा कि तुर्की को ऐसा नहीं करना चाहिए था. उन्होंने कहा, ''मैं ग़ुस्से में हूँ. मुझे बहुत गर्व रहा है कि तुर्की एकमात्र मुस्लिम मुल्क है जो सेक्युलर है लेकिन अब इसे सेक्युलरिज़म से दूर किया जा रहा है. आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमाल अतातुर्क ने हागिया सोफ़िया को मस्जिद से म्यूज़ियम बनाने का अहम फ़ैसला किया था. उन्होंने यह जानबूझकर किया था ताकि पूरी दुनिया को बता सकें कि हम सेक्युलर हैं और बाक़ी के मुस्लिम देशों से अलग हैं. हम यूरोपियन की तरह हैं और आधुनिक हैं, इसलिए हमें भी आप स्वीकार करें.''



ओरहान पामुक ने कहा, ''हागिया सोफ़िया को मस्जिद बनाने का फ़ैसला एक ग़लत क़दम है. अगर 10 फ़ीसदी अतिधार्मिक लोगों को छोड़ दें तो धर्मनिरपेक्षता सभी तुर्कों के लिए गर्व का विषय है. यहाँ तक कि अर्दोआन की पार्टी के मतदाताओं के लिए भी सेक्युलरिज़म गर्व का विषय है.''

इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व की जंग

अर्दोआन कई बार इस बात को कह चुके हैं कि तुर्की एकमात्र देश है, जो इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व कर सकता है. ज़ाहिर है अर्दोआन जब ऐसा कहते हैं तो उनके दिमाग़ में ऑटोमन साम्राज्य की विरासत रहती होगी.
वो ऑटोमन साम्राज्य, जो सोवियत संघ से भी बड़ा था. यह 2.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला था. ऑटोमन साम्राज्य का विस्तार मिस्र, ग्रीस, बुल्गारिया, रोमानिया, मेसिडोनिया, हंगरी, फ़लस्तीन, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, अरब के ज़्यादातर हिस्सों और उत्तरी अफ़्रीका के अधिकतर तटीय इलाक़ों तक था.
यह साम्राज्य मुस्लिम शासकों को मान्यता देता था. अर्दोआन को लगता है कि इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करना तुर्की का ऐतिहासिक हक़ है. लेकिन अर्दोआन इस बात को भूल जाते हैं कि वो अब 2.2 करोड़ वर्ग किलोमीटर वाले ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान नहीं हैं, बल्कि सात लाख 83 हज़ार वर्ग किलोमीटर में सिमट चुके तुर्की के राष्ट्रपति हैं.
1399 में स्थापित ऑटोमन साम्राज्य का पहले विश्व युद्ध के साथ ही 1923 में अंत हो गया और आधुनिक तुर्की बना.
दूसरी तरफ़ सऊदी अरब को लगता है कि हाउस ऑफ सऊद के नियंत्रण में इस्लामिक पवित्र स्थल मक्का और मदीना हैं. यहाँ हर साल दुनिया भर से 20 लाख से ज़्यादा मुसलमान आते हैं. ऐसे में इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व वही कर सकता है.
एक तीसरा खिलाड़ी ईरान है, जहाँ शिया मुसलमान हैं. ईरान भी जानता है कि सुन्नी प्रभुत्व वाले इस्लामिक दुनिया का वो नेतृत्व नहीं कर सकता है, लेकिन उसे यह देखने में बुरा नहीं लगता होगा कि दो अहम क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी कैसे एक दूसरे के ख़िलाफ़ लगे हुए हैं. सऊदी और तुर्की के टकराव पर पश्चिम के देशों की प्रतिक्रिया ईरान के लिए दिलचस्प होती है.



प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि भले ही 1932 में सऊदी अरब ब्रिटेन की मदद से तीसरी बार स्टेट बनने में सफल रहा लेकिन मुश्किलें आज भी कम नहीं हैं.
वो कहते हैं, ''इस्लामिक दुनिया में सऊदी और तुर्की के बीच नेतृत्व की जंग चल रही है, लेकिन सऊदी अमरीका के दम पर इस जंग को नहीं जीत सकता. सऊदी का तेल बहुत दिनों तक काम नहीं आने वाला है. अब तेल की ज़रूरतें बदल रही हैं और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत बढ़ रहे हैं. ऐसे में उसकी प्रासंगिकता अमरीका के लिए भी बहुत दिनों तक नहीं रहने जा रही.''

सऊदी अरब के लिए तुर्की ख़तरा?

अर्दोआन का इस्लामिक राष्ट्रवाद और सऊदी अरब को रोकने की रणनीति साथ-साथ चलते रहे हैं.
अर्दोआन की राजनीति में इस्लामिक रूढ़िवादी उनके राजनीतिक जीवन की बुनियाद है और सऊदी को रोकने की रणनीति उनकी विदेश नीति की बुनियाद.
अर्दोआन ने सऊदी अरब को कई बार रोकने की कोशिश की. सऊदी के ख़िलाफ़ क़तर की सुरक्षा में उन्होंने अपने सैनिकों को भेजा, सोमालिया से सऊदी के सहयोगियों को बाहर किया और लाल सागर में सैन्य अड्डा बनाने के लिए एक आइलैंड लीज पर लेने का समझौता किया.
इसके साथ ही अर्दोआन फ़लस्तीन और रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर भी मुखर रहे. इस्तांबुल अरब वर्ल्ड के बाग़ियों का भी पसंदीदा अड्डा बना.
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के स्कॉलर सोनेर कोगाप्ते ने 'द न्यू सुल्तान' नाम से अर्दोआन की जीवनी लिखी है. इस जीवनी में उन्होंने लिखा है, ''तुर्की के राष्ट्रपति की विदेश मामलों की रणनीति का लक्ष्य मुसलमान होने का गर्व वापस लाना है. वो ऑटोमन का आधुनिक वर्जन लाना चाहते हैं ताकि तुर्क इस्लामिक महानता का नेतृत्व कर सकें.''
अर्दोआन की चाहत के पीछे एक लंबा अतीत है. चार सदियों तक पूरे इस्लामिक वर्ल्ड का तुर्की का सुल्तान ख़लीफ़ा रहा. उसके धार्मिक नेतृत्व को ऑटोमन एम्पायर से बाहर की इस्लामिक सत्ता भी मानती थी.
पहले विश्व युद्ध में ब्रिटेन की मदद से अरब में ऑटोमन साम्राज्य के ख़िलाफ़ विद्रोह हुआ, जिसके बाद उसके हाथ से मक्का-मदीना निकल गया. इसके छह साल बाद 1924 में ख़लीफ़ा व्यवस्था का अंत हो गया.
लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में सऊदी अरब की प्रोफ़ेसर और सऊदी अरब का इतिहास लिखने वाली मदावी अल राशिद ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, ''अर्दोआन का नया तुर्की सऊदी अरब के लिए इस रूप में चुनौती है, क्योंकि वो वैकल्पिक इस्लामिक मॉडल पेश कर रहा है. यह सऊदी अरब के अस्तित्व के लिए ख़तरा है क्योंकि तुर्की इस्लामिक और लोकतांत्रिक दोनों है. सब कुछ के बावजूद इतना तो है कि अर्दोआन एक गणतंत्र पर शासन कर रहे हैं, जहाँ संसद है, विपक्ष है और सिविल सोसाइटी भी है जबकि सऊदी में ऐसा कुछ भी नहीं है.''
पिछले साल सऊदी के दबदबे वाले इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी को चुनौती देते हुए कुआलालुंपुर में एक बैठक हुई थी. इस बैठक में ईरान, तुर्की और मलेशिया बहुत मुखर रहे, लेकिन सऊदी के नेतृत्व वाले सहयोगी देशों ने पाकिस्तान को इसमें शरीक होने से रोक दिया था.
अर्दोआन चाहते हैं कि सऊदी के दबदबे को चुनौती देकर वो अपना सिक्का चलाएँ. अर्दोआन को लगता है कि ओआईसी इस्लामिक देशों की आकांक्षा नहीं, बल्कि सऊदी की मनमानी को पूरा करने का ज़रिया है. अर्दोआन ओआईसी के समानांतर एक संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं.

अतातुर्क के तुर्की में अर्दोआन

अर्दोआन 1994 में इस्तांबुल के पहले इस्लामिक रूढ़िवादी मेयर बने. इसके बाद से रैलियों में अर्दोआन के भाषण की चर्चा अक़्सर होती थी. वो अपनी रैलियों में तुर्की के राष्ट्रवादी विचारक ज़िया गोकाई के इस उद्धरण को अक्सर दोहराते थे-'मस्जिदें हमारी छावनी हैं, गुंबदें हमारी रक्षा कवच, मीनारें हमारी तलवार और इस्लाम के अनुयायी हमारे सैनिक हैं.'
लेकिन विडंबना ही है कि इराक़ पर अमरीका के हमले में इस्लाम के हज़ारों अनुयायी मारे गए, मस्जिदें ध्वस्त हुईं, मीनारे टूटीं और अर्दोआन इस युद्ध में अमरीका के साथ थे.



अर्दोआन के तुर्की की राजनीति में उभार में इस्लामिक कट्टरता की अहम भूमिका रही है. उनके भाषणों से मुसलमानों को यह लगता होगा कि वो धर्म की रक्षा और उसके हित की बात कर रहे हैं लेकिन इसके साथ ही कई तरह के विरोधाभास भी दिखते हैं.
अर्दोआन जब 2003 में तुर्की के प्रधानमंत्री बने, तभी अमरीका इराक़ पर हमले की तैयारी कर रहा था. अर्दोआन की सद्दाम हुसैन से नहीं बनती थी. यहाँ तक कि उन्होंने अमरीका को इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध में तुर्की की ज़मीन का इस्तेमाल करने देने का मन बना लिया था.
हालाँकि अर्दोआन का यह इरादा पूरा नहीं हुआ क्योंकि संसद में तीन वोट से यह प्रस्ताव गिर गया.
ऐसा तब हुआ जब उनकी पार्टी के पास संसद में दो तिहाई बहुमत था. इसे लेकर अमरीका का तत्कालीन बुश प्रशासन बहुत ख़फ़ा हुआ, हालाँकि इसके बावजूद अर्दोआन ने अमरीका को तुर्की के हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की छूट दे रखी थी.
एक तरफ़ अर्दोआन का मुस्लिम प्राइड और उसके हित की बात करना और दूसरी तरफ़ इराक़ में अमरीका के हमले का समर्थन करना दोनों बिल्कुल उलट हैं.
अर्दोआन इस्लामिक प्रतीकों को लेकर बहुत सजग रहे हैं. उनकी पत्नी हिजाब पहनती हैं. तुर्की में हिजाब प्रतिबंधित था. हिजाब के साथ लड़कियाँ यूनिवर्सिटी नहीं जा सकती थीं. अर्दोआन की पत्नी हिजाब के कारण ही किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं जाती थीं.
2003 में पहली बार तुर्की के प्रधानमंत्री बनने के बाद अर्दोआन ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''मैं कुछ भी होने से पहले एक मुसलमान हूँ. एक मुसलमान के तौर पर मैं अपने मज़हब का पालन करता हूं. अल्लाह के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी है. उसी के कारण मैं हूँ. मैं कोशिश करता हूँ कि उस ज़िम्मेदारी को पूरा कर सकूँ.''
यहाँ तक कि अर्दोआन ने अपनी बेटियों को इंडियाना यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए भेजा, क्योंकि वहाँ वो हिजाब पहन सकती थीं.



ऑटोमन साम्राज्य को हटाकर आधुनिक तुर्की बनाने वाले कमाल अतातुर्क ने पारंपरिक इस्लाम को ख़ारिज कर दिया था. उनका लक्ष्य था कि तुर्की एक आधुनिक यूरोपियन मुल्क बने.
अतातुर्क ने इस्लामिक ख़लीफ़ाओं को ख़ारिज कर दिया. मज़हबी अदालतें ख़त्म कीं और स्कूलों को भी सेक्युलर बनाया था. अतातुर्क ने अरबी लिपि को छोड़ रोमन लिपि तुर्की के लिए अपनाई. रिपब्लिक ऑफ तुर्की में अतातुर्क ने स्विस सिविल कोड को लागू किया और महिलाओं को वोटिंग का अधिकार दिया.
यह कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि अतातुर्क के देश का कोई राष्ट्रपति ये कहेगा कि मुसलमान परिवार नियोजन को नकार दें.
2016 में इस्तांबुल में एक भाषण के दौरान अर्दोआन ने कहा था, ''महिलाओं की यह ज़िम्मेदारी है कि वो तुर्की की आबादी को दुरुस्त रखें. हमें अपने वंशजों की संख्या बढ़ाने की ज़रूरत है. लोग आबादी कम करने और परिवार नियोजन की बात करते हैं लेकिन मुस्लिम परिवार इसे स्वीकार नहीं कर सकता है. हमारे अल्लाह और पैग़म्बर ने यही कहा था और हम लोग इसी रास्ते पर चलेंगे.''
अभी तुर्की की आबादी 8.2 करोड़ है.



ऑटोमन साम्राज्य के गठन पर बनी टीवी सिरीज़ 'दिरलिस एर्तरुल' को तुर्की के सरकारी टीवी टीआरटी वन पर प्रसारित किया गया. इसके अब तक पाँच सीज़न आ चुके हैं और कुल 448 एपिसोड हैं.
पहला सीज़न एनोतोलिया में क्रुसेडर्स के ख़िलाफ़ अभियान है. दूसरे में मंगोलों के ख़िलाफ़, तीसरे में ईसाई बैज़नटाइन के ख़िलाफ़ है. चौथे में सेल्जुक की आपसी लड़ाइयाँ और फिर ऑटोमन का गठन. पूरी सिरीज़ में ऐतिहासिक तथ्यों से ज़्यादा इस्लामिक राष्ट्रवाद और अर्दोआन की राजनीति के साथ वर्तमान सियासी मूड को भुनाने की कोशिश की गई है.
पश्चिम के मीडिया में कहा जाता है कि तुर्की का राष्ट्रीय मिज़ाज उस वक़्त के लोकप्रिय टीवी शो से समझा जा सकता है. कुछ साल पहले तुर्की में सुल्तान सुलेमान के जीवन पर 'द मैग्निफिसेंट सेंचुरी' नाम से एक टीवी ड्रामा बना था.
16वीं सदी में सुल्तान सुलेमान के नेतृत्व में ऑटोमन साम्राज्य शिखर पर था और इस ड्रामा में इसे ही दिखाया गया है. यह ड्रामा भी तुर्की में धमाकेदार साबित हुआ था.
2002 में अर्दोआन की पार्टी जब से सत्ता में आई है, तबसे तुर्की में टेलीविजन सीरियल विदेशों से कमाई का सबसे बढ़िया ज़रिया बन गया है. 2017 में 150 से ज़्यादा टर्किश टीवी ड्रामा 100 ज़्यादा देशों में बेचे गए.
2016 में ही टर्किश टीवी ड्रामे का सालाना निर्यात 30 करोड़ डॉलर पहुँच गया था. टर्किश ग्लोबल एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में यह 35 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया था. 2023 तक एक अरब डॉलर तक पहुँचने की बात कही जा रही है. टर्किश टीवी ड्रामे की लोकप्रियता से वहाँ विदेशी पर्यटकों की तादाद भी बढ़ी.
ऐसा नहीं है कि तुर्की में अतातुर्क की सेक्युलर परंपरा की जड़ें इतनी कमज़ोर हो गई हैं. अंकारा यूनिवर्सिटी में छह महीने तक एक प्रोजेक्ट पर काम करने गए दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर विनोद तिवारी कहते हैं कि तुर्की में सेक्युलर माइंड के लोग भी बहुत प्रभावी हैं.
वो कहते हैं कि ये ज़रूर है कि अर्दोआन के आने के बाद से ध्रुवीकरण बढ़ा है और अतातुर्क के मिज़ाज वाला तुर्की कमज़ोर हुआ है.
दिरलिस एर्तरुल को लेकर भी तुर्की में सांस्कृतिक गोलबंदी देखने को मिली. धार्मिक रूढ़िवादियों ने इसका जमकर समर्थन किया जबकि सेक्युलर धड़े ने इसकी धज्जियां उड़ाईं.
साल 2016 के नवंबर महीने में एक अवॉर्ड सेरिमनी थी. इस समारोह के प्रेजेंटर ने एर्तरुल सिरीज़ का मज़ाक़ उड़ाया और इसके किरदारों को अवॉर्ड लेने के बाद बोलने नहीं दिया. इसके स्क्रिप्ट राइटर ने इसे अपमान बताते हुए अवॉर्ड लौटाने की बात कही. पूरे विवाद में राष्ट्रपति अर्दोआन भी आ धमके. उन्होंने दिरलिस: एर्तरुल की तारीफ़ की.



अर्दोआन ने कहा, ''जब तक शेर अपना इतिहास लिखना ख़ुद नहीं शुरू करेगा तब तक उसके शिकारी हीरो बनाए जाते रहेंगे.'' इस टीवी ड्रामे के लेखक महमत बोज़दाग अर्दोआन की पार्टी के सदस्य हैं.
इस टीवी ड्रामे को लेकर टर्किश स्कॉलर सेमही सिनानोअलु ने कल्चरल जर्नरल बिरिकिम में लिखा है कि कैसे इस तरह की टीवी सिरीज़ वर्तमान राजनीतिक शासन को प्रासंगिक बनाए रखने में राजनीतिक हथियार के तौर पर काम करती है.
सेमही ने लिखा है, ''सिरीज़ के अनुसार- 'तुर्की के दुश्मनों के नाम भले बदल गए हों लेकिन उनके सार अब भी मौजूद हैं और ये उस्मानिया सल्तनत के गठन से पहले से ही है. इन शत्रुओं का उद्देश्य देश को बाँटना है.' ऐसे नैरेटिव से एक तरह की साज़िश की बात फैलाई जाती है और उसका राजनीतिक फ़ायदे लिए इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे टीवी ड्रामे की लोकप्रियता से यह भी पता चलता है कि दर्शक तुर्की की वर्तमान हालात से जूझने के बदले एक फंतासी भरी दुनिया में जाना चुन रहे हैं. तुर्की की बिगड़ती आर्थिक हालत और सीरिया संकट से ध्यान हटाने के लिए ऐसे टीवी ड्रामे राजनीतिक टूल की तरह काम करते हैं.''
यह टीवी ड्रामा कई इस्लामिक देशों में प्रतिबंधित है. सऊदी अरब, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात में दिरलिस: एर्तरुल पर पाबंदी लगी हुई है. ये देश तुर्की के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं. बल्कि सऊदी अरब एर्तरुल के जवाब में एक बड़े बजट का टीवी ड्रामा बनाने जा रहा है.

दिरलिस एर्तरुल की आलोचना क्यों?

इस ड्रामा के निर्माता और कहानी लिखने वाले महमत बोज़दाग ने कहा है कि तथ्य अहम नहीं हैं. यह ड्रामा इतिहास की कसौटी पर कितना खरा है इसे लेकर महमत बोज़दाग ने कहा था, ''एनातोलिया के जिस दौर को हमने इस ड्रामे में दिखाया है उसके बारे में बहुत कम जानकारी मौजूद है. पूरी जानकारी चार से पाँच पन्नों से ज़्यादा नहीं है. यहां तक कि अलग-अलग स्रोतों में सबके नाम भी अलग-अलग हैं. ऐतिहासिक तथ्यों से मेल का हम दावा नहीं कर सकते. हमने एक काल्पनिक कहानी दिखाई है.''



दिरलिस: एर्तरुल टर्किश टीवी ड्रामे को अगर तीन शब्दों में बताएं तो ये तीन शब्द हो सकते हैं- इस्लाम, घोड़े की टाप और तलवार.
इसमें बताने की कोशिश की गई है कि एर्तरुल अल्लाह के बताए रास्तों पर चल रहा है और इसे अंजाम देना अल्लाह की आज्ञा का पालन है. भयानक हिंसा है. कई बार तो सिर कलम का दृश्य देखते हुए इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों के सिर कलम की याद आ जाती है. पूरे ड्रामे में इस्लामिक श्रेष्ठता का बोध है.
पाकिस्तान के राजनीतिक टिप्पणीकार परवेज़ हुदभाय कहते हैं, ''अगर इस टीवी ड्रामे के ज़रिए इस्लाम को शांतिप्रिय धर्म बताने की कोशिश की गई है या इस्लामोफ़ोबिया से काउंटर के लिए है तो इसका नतीजा बिल्कुल उलट होगा. पहले सीज़न के पहले एपिसोड का शुरुआती दृश्य है- तुर्क कबीलों के टेंट में लोग तलवार बना रहे हैं और उसकी धार को तेज़ कर रहे हैं. तुर्क कबीलों की ईसाइयों और बाइज़ेंटाइन से दुश्मनी है. हर लड़ाई में मारे जाने पर ईसाइयों के शव ख़ून से लथपथ बिखरे पड़े होते हैं. हीरो एर्तरुल ग़ाज़ी न केवल मामूली सिपाहियों का सिर कलम करता है बल्कि अपने कबीले के लोगों का सिर और धड़ अलग करता है. अगर इस्लामिक स्टेट इससे प्रेरणा लेने लगे तो क्या हमें इससे हैरान होना चाहिए? क्या तलवार की महिमा गान इस्लाम की महिमा का बखान है? एक कबीलाई समाज के भीतर के सत्ता संघर्षों की तुलना में इस्लाम को निश्चित तौर पर और सकारात्मक रूप में दिखाया जा सकता है.''

जिस ऑटोमन पर अर्दोआन को गर्व उसके वारिस क्या कहते हैं?








न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2006 में एर्तरुल उस्मान से पूछा था कि क्या वो चाहते हैं कि ऑटोमन साम्राज्य को रीस्टोर किया जाए? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था, ''मैं बहुत प्रैक्टिकल व्यक्ति हूँ.'' वहीं 2008 में अल जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में एर्तरुल उस्मान ने कहा था कि तुर्की में लोकतंत्र बढ़िया काम कर रहा है.
एर्तरुल उस्मान ने ऑटोमन सम्राज्य के आख़िरी शासक को बेदख़ल करने वाले मुस्तफ़ा कमाल पाशा अतातुर्क के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया था. जब ऑटोमन का पतन हुआ तो एर्तरुल उस्मान की उम्र 12 साल थी. 1924 में इस शाही परिवार को टर्किश रिपब्लिक के संस्थापक अतातुर्क ने निर्वासित कर दिया. एर्तरुल उस्मान ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि परिवार के पुरुषों को निर्वासन के लिए एक दिन का वक़्त दिया गया था और महिलाओं को दो हफ़्ते का.
एर्तरुल उस्मान ने स्कूल की पढ़ाई वियना में की और 1939 में अमरीका चले गए थे. वो 53 साल बाद अगस्त 1992 में प्रधानमंत्री के निमंत्रण पर तुर्की आए थे. इस दौरे में डोलमाबाचे पैलेस भी गए था. यह 285 कमरों का एक महल है जो उनके दादा का घर हुआ करता था. एर्तरुल उस्मान का 97 साल की उम्र में 23 सितंबर, 2009 में निधन हो गया था.
एर्तरुल उस्मान की पत्नी ज़ीनप अफ़ग़ानिस्तान के राजा अमानुल्लाह की भतीजी थीं. ज़ीनप एर्तरुल उस्मान से 30 साल छोटी थीं. जीनप ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा था कि एर्तरुल उस्मान इस्लाम को लेकर उदार रुख़ रखते थे.
टर्किश पत्रकार दिदेम यिलमाज़ ने 2003 में ऑटोमन साम्राज्य के ख़ात्मे के बाद इस परिवार पर 'सीकिंग द सुल्तान' टाइटल से एक डॉक्युमेंट्री बनाई थी. यिलमाज़ ने एर्तरुल उस्मान और उनकी पत्नी ज़ीनप उस्मान की बातचीत के बारे में अपने इंटरव्यू की कुछ दिलचस्प बातें बताई हैं.
एर्तरुल उस्मान ऑटोमन साम्राज्य के 45वें प्रमुख थे और इस साम्राज्य के 1876 से 1909 तक शासक रहे अब्दुल हामिद द्वितीय के पोते. अगर ऑटोमन साम्राज्य का 1923 में पतन ना हुआ होता या इसे फिर से स्थापित किया जाता तो एर्तरुल उस्मान ही इस साम्राज्य के नए सुल्तान बनते. सुल्तान की बात तो दूर एर्तरुल उस्मान ने अपने जीवन के 64 साल न्यूयॉर्क के मैनहटन में बिना लिफ्‍ट वाले अपार्टमेंट में दो बेडरूम के एक साधारण फ़्लैट में काटा. यह किराए का घर था.





न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2006 में एर्तरुल उस्मान से पूछा था कि क्या वो चाहते हैं कि ऑटोमन साम्राज्य को रीस्टोर किया जाए? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था, ''मैं बहुत प्रैक्टिकल व्यक्ति हूँ.'' वहीं 2008 में अल जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में एर्तरुल उस्मान ने कहा था कि तुर्की में लोकतंत्र बढ़िया काम कर रहा है.
एर्तरुल उस्मान ने ऑटोमन सम्राज्य के आख़िरी शासक को बेदख़ल करने वाले मुस्तफ़ा कमाल पाशा अतातुर्क के ख़िलाफ़ कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया था. जब ऑटोमन का पतन हुआ तो एर्तरुल उस्मान की उम्र 12 साल थी. 1924 में इस शाही परिवार को टर्किश रिपब्लिक के संस्थापक अतातुर्क ने निर्वासित कर दिया. एर्तरुल उस्मान ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि परिवार के पुरुषों को निर्वासन के लिए एक दिन का वक़्त दिया गया था और महिलाओं को दो हफ़्ते का.
एर्तरुल उस्मान ने स्कूल की पढ़ाई वियना में की और 1939 में अमरीका चले गए थे. वो 53 साल बाद अगस्त 1992 में प्रधानमंत्री के निमंत्रण पर तुर्की आए थे. इस दौरे में डोलमाबाचे पैलेस भी गए था. यह 285 कमरों का एक महल है जो उनके दादा का घर हुआ करता था. एर्तरुल उस्मान का 97 साल की उम्र में 23 सितंबर, 2009 में निधन हो गया था.
एर्तरुल उस्मान की पत्नी ज़ीनप अफ़ग़ानिस्तान के राजा अमानुल्लाह की भतीजी थीं. ज़ीनप एर्तरुल उस्मान से 30 साल छोटी थीं. जीनप ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा था कि एर्तरुल उस्मान इस्लाम को लेकर उदार रुख़ रखते थे.
टर्किश पत्रकार दिदेम यिलमाज़ ने 2003 में ऑटोमन साम्राज्य के ख़ात्मे के बाद इस परिवार पर 'सीकिंग द सुल्तान' टाइटल से एक डॉक्युमेंट्री बनाई थी. यिलमाज़ ने एर्तरुल उस्मान और उनकी पत्नी ज़ीनप उस्मान की बातचीत के बारे में अपने इंटरव्यू की कुछ दिलचस्प बातें बताई हैं.



यालमिज़ ने इस इंटरव्यू के बारे में कहा है, ''मैंने एर्तरुल उस्मान की पत्नी ज़ीनप को फ़ोन किया और बात करने का मक़सद बताया. ज़ीनप ने बिना कोई लाग लपेट के कहा- 'इतिहास के क्रूर तथ्यों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं कहानी के मानवीय पक्ष में भले दिलचस्पी रखती हूं.'
यालमिज़ ने बताया कि अगर ऑटोमन साम्राज्य ज़िंदा होता तो एर्तरुल उस्मान इस साम्राज्य के सुल्तान होते लेकिन ये शख़्स आज ग़रीबी में जी रहा है. इसके बावजूद इनके मन में कोई कड़वाहट नहीं है. उनके मन में दया है और बिल्कुल खुले दिमाग़ के हैं. मैंने एर्तरुल उस्मान के मन में देश और दुनिया की अच्छी समझ और अतीत के गौरव से मुक्त व्यक्ति को पाया.''
जिस ऑटोमन साम्राज्य के परिवार में अपने इतिहास को लेकर वैसा गौरव बोध और फिर से उसे ज़िंदा करने की तमन्ना नहीं थी उसी सल्तनत पर बने एक टीवी ड्रामा 'दिरलिस: एर्तरुल' से मुस्लिम दुनिया में इस क़दर हलचल क्यों है? अतातुर्क के कारण इस परिवार को निर्वासन में जाना पड़ा तब भी कमाल पाशा के ख़िलाफ़ इस परिवार ने एक शब्द नहीं कहा. लेकिन अर्दोआन का नेतृत्व तुर्की को बदलने में लगा है.
मध्य-पूर्व की राजनीति को क़रीब से समझने वाले और खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''जैसे नेहरू के भारत को वर्तमान सरकार बदल रही है वैसे ही अतातुर्क के सेक्युलर तुर्की को अर्दोआन इस्लामिक तुर्की बनाने में लगे हैं. जिस भारत की नींव नेहरू ने रखी थी वो हिल चुकी है और जिस सेक्युलर और आधुनिक रिपब्लिक ऑफ तुर्की की नींव अतातुर्क ने रखी थी वो भी अवसान की ओर है.''
तलमीज़ अहमद कहते हैं कि मसला एक टीवी ड्रामे का नहीं है. वो कहते हैं, ''एक वक़्त था जब दुनिया के बड़े हिस्से पर मुसलमानों का शासन था. भारत में मुग़ल साम्राज्य, ईरान में सफ़विद साम्राज्य और दुनिया के एक बड़े इलाक़े में ऑटोमन साम्राज्य. मुग़ल और ऑटोमन का तो बहुत बड़े इलाक़े पर शासन था और दोनों की ताक़त भी बेहिसाब थी. सफ़विद साम्राज्य 18वीं सदी में, मुग़ल 19वीं सदी में और उस्मानिया 20वीं सदी में ख़त्म हो गए".
वे कहते हैं, "इन तीनों साम्राज्यों को इस्लामिक प्राइड और सक्सेस नैरेटिव के तौर पर देखा जाता था. उस्मानिया सल्तनत के 20वीं सदी में मिटने के बाद से इस्लामिक दुनिया में हार का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ. यह अब तक जारी है. इस टर्किश टीवी ड्रामे में उस्मानिया सल्तनत को इस्लामिक प्राइड और सक्सेस नैरेटिव के तौर पर ही दिखाया गया है. जिस कौम में इतनी मायूसी हो वहां इतिहास को वर्तमान सियासी मूड के अनुसार पैकेजिंग करना बहुत असरदार साबित होता है. इस टीवी ड्रामे के साथ भी यही है.''
तलमीज़ अहद कहते हैं कि इस्लामिक दुनिया में मायूसी है और सक्सेस नैरेटिव ख़त्म हो चुका है. वो कहते हैं, ''इस मायूसी को वहां के नेता अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. अपनी नाकामी को छुपाने का सबसे अच्छा फॉर्म्युला है कि लोगों को इतिहास के गौरव बोध में ले जाकर छोड़ दो. यहां से फिर आगे नहीं पीछे लौटने की प्रक्रिया शुरू होती है. लेकिन तुर्की के साथ दिक़्क़त यह है कि वो अतातुर्क से पीछे भले जा सकता है लेकिन इतना पीछे कभी नहीं जा पाएगा कि वो फिर से ऑटोमन साम्राज्य को खड़ा कर ले.''
तलमीज़ अहमद कहते हैं कि इस्लामिक दुनिया में अभी 'डिफीट नैरेटिव' घर किए हुए है. वो कहते हैं, ''इसकी शुरुआत 20वीं सदी से होती है. 1948 में अरब के मुसलमानों की नाक के नीचे इसराइल का बनना अपमानजनक था. इस्लामिक दुनिया में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिस पर मुसलमान गर्व कर सकें. पश्चिमी देशों का वर्चस्व बढ़ता गया और दूसरी तरफ़ मुसलमानों को आतंकवाद से जोड़ा गया और इस्लामोफ़ोबिया पूरी दुनिया में मज़बूती से उभरा. अर्दोआन तुर्की को जिस रास्ते पर ले जा रहे हैं उसमें मुसलमानों को समाधान नहीं मिलने वाला.''

इस्लाम के ज़रिए तुर्की की सांस्कृतिक घुसपैठ?

पाकिस्तान में तो दिरलिस: एर्तरुल' टीवी ड्रामे ने व्यूअरशिप के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. पीटीवी ने एर्तरुल टीवी ड्रामे के उर्दू डब एपिसोड के लिए इसी साल 18 अप्रैल को एक यूट्यूब चैनल बनाया. कुछ ही घंटों में इस चैनल के एक लाख सब्सक्राइबर हो गए और नौ मई तक 10 लाख लोगों ने सब्सक्राइब किया.
आज की तारीख़ में इसके 62 लाख से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने लोगों से कहा कि उन्होंने इसे ख़ुद देखा है और सभी पाकिस्तानियों से देखने की भी अपील की.
इस ड्रामे में शामिल कलाकारों को लोगों ने ऑटोमन साम्राज्य के असल किरदारों की तरह देखना शुरू कर दिया. पाकिस्तान के लोग दिरलिस: एर्तरुल' की महिला कलाकारों की बिकनी पहने पुरानी फोटो देख भड़क जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर आपत्ति जता रहे हैं.
इसी साल फ़रवरी में जब तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन पाकिस्तान के दौरे पर आए तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान साझा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बड़े गर्व से कहा कि तुर्कों ने हिन्दुस्तान पर 600 सालों तक शासन किया.



इमरान ख़ान ने कहा, ''आपके आने से हम सबको इसलिए भी ख़ुशी हुई कि कौम समझती है कि तुर्की से हमारे रिश्ते सदियों से हैं. तुर्कों ने तो 600 साल तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की थी.''
पाकिस्तान के जाने-माने इतिहासकार मुबारक अली कहते हैं कि एक तो इमरान ख़ान को तारीख़ का इल्म नहीं है और जब वो इतिहास का हवाला देते हैं तो मजहब के आईने में ही देखते हैं. मुबारक अली कहते हैं कि कोई साम्राज्यवादी व्यवस्था का आज की तारीख़ में इतना गुणगान कैसे कर सकता है? क्या इमरान ख़ान ऐसा इसलिए नहीं कर रहे हैं कि ये शासक मुसलमान थे?
लाहौर के फोरमैन क्रिस्चन कॉलेज-यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे परवेज़ हुदभाय कहते हैं कि अर्दोआन न केवल इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करना चाहते हैं बल्कि वो ये भी स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि इस्लाम ही सर्वश्रेष्ठ है. प्रोफ़ेसर हुदभाय ने कहा, ''मैं आपसे बात करने से पहले ड्राइव करते हुए लता मंगेशकर के गाने सुन रहा था. आप ग़ुलाम अली के सुनते होंगे. लेकिन धार्मिक श्रेष्ठता के कारण हम दोनों एक दूसरे को सुनना बंद कर दें तो क्या इससे कोई मज़हब ऊंचा हो जाएगा? हम नीचे जाएंगे. हम अपनी मिट्टी, साझी संस्कृति और इतिहास से दूर जाएंगे. अर्दोआन का जो इस्लामिक प्रोजेक्ट है उसमें मुसलमानों के लिए ऑटोमन, श्रेष्ठता की ग्रंथि, तलवार, हिंसा और दकियानूस है. ज्ञान-विज्ञान, संगीत, कला और साझी संस्कृति के लिए कोई जगह नहीं है. पाकिस्तानियों को यह ख़ूब रास आ रहा है.''
1980 के दशक में पाकिस्तान पर शासन करने वाले सैन्य तानाशाह ज़िआ उल-हक़ ने कहा था, ''पाकिस्तान एक आइडियोलॉजिकल स्टेट है. अगर आप पाकिस्तान से इस्लाम को किनारे कर सेक्युलर स्टेट बनाते हैं तो यह बिखर जाएगा.'' पाकिस्तान विदेशी मुस्लिम हस्तियों से अपनी पहचान जोड़ने की कोशिश करता रहा है. इमरान ख़ान का ऑटोमन साम्राज्य के गठन पर बने टर्किश टीवी ड्रामा देखने की अपील पाकिस्तानी शासकों की अपनी पहचान खोजने की कोशिश का ही हिस्सा है. लेकिन सवाल उठना लाजिम था कि एक प्रधानमंत्री उस टीवी सिरीज़ को क्यों प्रमोट कर रहा है जिसमें दूसरे धर्म को दुश्मन के तौर पर दिखाया गया है.
इस टर्किश टीवी ड्रामे पर इमरान ख़ान की बेताबी पर 'पाकिस्तान अंडर सीज़: एक्स्ट्रिमिज़म, सोसाइटी एंड स्टेट' की लेखिका मदीहा अफ़ज़ल ने रेडियो फ़्री यूरोप से कहा है, ''पाकिस्तान अपने राष्ट्रवाद को इस्लाम और भारत से दुश्मनी के आधार पर पारिभाषित करता है. इस लिहाज से 'दिरलिस: एर्तरुल' ड्रामा को पाकिस्तानियों से देखने की अपील करना चौंकाता नहीं है.''
पाकिस्तान के जाने-माने अभिनेता जमाल शाह का कहना है कि दिरलिस: एर्तरुल ख़तरनाक है "क्योंकि इसका इस्तेमाल पाकिस्तानी नेता युवाओं को भ्रमित करने में कर रहे हैं. यह ड्रामा पूरी तरह से प्रॉपेगैंडा है. पाकिस्तान के भीतर एक समझ है कि पश्चिम के देश और भारत मुस्लिम विरोधी हैं. यहां की राजनीति पाकिस्तानियों की इसी समझ का टीवी ड्रामे के ज़रिए दोहन कर रही है".
कुल मिलाकर तुर्की के नेता इस्लाम के पुराने वैभव के ज़रिए अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वे टीवी सीरियल के ज़रिए अपने समर्थकों को भले लामबंद कर सकते हैं लेकिन ऑटोमन साम्राज को ज़िंदा नहीं कर सकते.