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Sunday, 4 October 2020

बंगाल के अकाल में 30 लाख से अधिक मौतें - 1943

From BBC Hindi..
जब मैं बच्ची थी तब मैंने पहली बार विंस्टन चर्चिल के बारे में पढ़ा था. एनिड ब्लॉयटन की एक किताब जो मैं पढ़ रही थी उसमें एक कैरेक्टर उनकी ज़बरदस्त प्रशंसक थी. वो उन्हें 'एक महान नेता मानती' थी. जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई वैसे-वैसे भारत के औपनिवेशिक इतिहास को लेकर होने वाली तमाम तरह की बातों का हिस्सा मैं बनी. मैंने पाया कि विंस्टन चर्चिल को लेकर हमारे देश में लोगों की राय अलग-अलग है. औपिनिवेशिक काल को लेकर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग मानते हैं कि अंग्रे़ज़ों ने भारत के लिए बहुत कुछ किया. इसमें रेलवे के निर्माण से लेकर डाक सेवाएं जैसे काम शामिल हैं तो कुछ मेरी दादी की तरह मानते हैं कि, "ये सब उन्होंने अपने फ़ायदे के लिए किया और भारत को ग़रीब और लूट-खसोट कर छोड़ दिया." मेरी दादी हमेशा बड़े चाव से बताती थीं कि कैसे उन्होंने 'क्रूर ब्रितानियों' के ख़िलाफ़ आंदोलन में हिस्सा लिया था. लेकिन इस आक्रोश के बावजूद लोगों में पश्चिमी चीज़ों और गोरों की कही गई बात और उनके द्वारा कुछ भी किए जाने को लेकर उनके प्रति एक उच्चता का बोध रहता था. दशकों तक रहे औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के अंतर्गत लोगों का आत्मविश्वास बिल्कुल ख़त्म हो गया था. आज़ादी के बाद के 73 सालों में बहुत कुछ बदल गया है. दुनिया में अपनी जगह को लेकर आत्मविश्वास से भरी नई पीढ़ी अब सवाल कर रही है कि क्यों 1943 के बंगाल के अकाल जैसे औपनिवेशिक इतिहास के काले अध्यायों को लेकर और विस्तार से जानकारी उपलब्ध नहीं है. इस अकाल के दौरान क़रीब तीस लाख लोग भूख से मारे गए थे. यह तादाद दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सम्राज्य के अंदर मारे गए लोगों से क़रीब छह गुना ज़्यादा है.
लेकिन हर साल युद्ध की जीत और उसमें हुए नुक़सान को तो याद किया जाता है लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ही ब्रितानी हुकूमत वाले बंगाल में हुई इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी को लगभग भुला दिया जाता है. प्रत्यक्षदर्शी उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे खेतों में लाशें पड़ी हुई थीं. नदियों में मरे हुए लोगों की लाशें तैर रही थीं और कैसे कुत्ते और गिद्ध लाशों को नोचकर खा रहे थे. इतने बड़े पैमाने पर किसी की भी न हिम्मत थी उन लाशों के अंतिम क्रिया क्रम करने की और ना ही सामर्थ्य. जो गांवों में बच गए थे, वो खाने की तलाश में क़स्बों और शहरों की ओर भाग रहे थे. बंगाल के मशहूर अभिनेता सौमित्र चटर्जी बंगाल के अकाल के वक़्त आठ साल के थे. वो बताते हैं, "हर कोई कंकाल की तरह नज़र आता था. लगता था मानो किसी ने कंकाल को चमड़ा पहना दिया है." वो बताते हैं, "लोग बेसहाय होकर रोते हुए चावल से निकलने वाला पानी (माड़) मांगते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि किसी के पास दूसरे को देने के लिए चावल नहीं है. जिस किसी ने भी वो दयनीय आवाज़ अपनी ज़िंदगी में सुनी है, वो कभी भी उस आवाज़ को भूल नहीं पाया. अभी उस दौर की बात करते हुए मेरे आंखों में आंसू आ गए हैं और मैं ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूँ." चर्चिल की कैबिनेट पर क्या हैं आरोप? 1942 में तूफ़ान और बाढ़ के आने की वजह से ये अकाल पड़ा था. लेकिन विंस्टन चर्चिल और उनकी कैबिनेट के ऊपर इसे और बदतर स्थिति में लाने का इल्ज़ाम लगाया जाता है. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की इतिहासकार यास्मीन ख़ान बताती हैं कि बर्मा से जापानियों के घुसपैठ के ख़तरे को देखते हुए 'नज़रअंदाज़ करने की नीति' अपनाई गई थी. वो बताती हैं, "इसके पीछे सोच यह थी कि फ़सल समेत सभी चीज़ों को ख़त्म कर दिया जाए. यहाँ तक कि जो नावें फ़सलों को ले जाने में इस्तेमाल होती हैं, उन्हें भी बर्बाद कर दिया जाए ताकि जापानी जब आएं तो उनके पास आगे बढ़ने के लिए कोई भी संसाधन ना हो. इसकी नीति का असर यह हुआ कि अकाल और विकराल रूप में सामने आया." ब्रितानी अधिकारियों की डायरी से पता चलता है कि चर्चिल प्रशासन भारत अनाज निर्यात करने की मांग को इस डर से खारिज कर दिया कि कहीं ब्रिटेन के भंडार में कमी ना आ जाए. चर्चिल का मानना था कि स्थानीय नेता भुखमरी को दूर करने में ज़्यादा मदद कर सकते हैं. इन बातों से तब के ब्रितानी प्रधानमंत्री के भारत के प्रति रवैये का पता चलता है. भारत के लिए नियुक्त मंत्री लियोपोल्ड एमेरी के मुताबिक़, एक बार चर्चिल ने अकाल के दौरान मदद करने को लेकर होने वाले विचार-विमर्श के दौरान कहा था कि भारत के लिए कोई भी मदद नाकाफ़ी होगी क्योंकि "भारतीय खरगोश की तरह बच्चे पैदा करते हैं."
यास्मीन ख़ान कहती हैं, "हम उन्हें अकाल के लिए किसी भी तरह से दोषी नहीं ठहरा सकते हैं लेकिन हम कह सकते हैं कि सक्षम होने के बावजूद उन्होंने राहत पहुँचाने की कोशिश नहीं की और उन्होंने गोरों की ज़िंदगी को दक्षिण एशियाई लोगों की ज़िंदगी के ऊपर तरजीह दी. यह वाकई में अन्यायपूर्ण था क्योंकि उस वक़्त लाखों भारतीय सैनिक दूसरे विश्व युद्ध में लड़ रहे थे." ब्रिटेन में कुछ लोग दावा करते हैं कि चर्चिल ने भले ही भारत के बारे में अशोभनीय टिप्पणी की होगी लेकिन उन्होंने मदद करने की कोशिश ज़रूर की थी. युद्ध की वजह से इसमें देरी हुई. सच तो यही है कि लाखों लोग उनकी नज़र के सामने खाने के लिए तरसते हुए मारे गए. उस वक़्त आर्चीबैल्ड वैवेल भारत के वायसराय थे. उन्होंने बंगाल के अकाल को ब्रितानी हुकूमत के अंदर होने वाली सबसे बड़ी त्रासदियों में बताया था. उन्होंने कहा कि इससे जो ब्रितानी साम्राज्य की छवि को जो नुकसान हुआ है, उसकी भारपाई नहीं की जा सकती. सौमित्र चटर्जी कहते हैं, "लोगों को उम्मीद है कि यह वक़्त ब्रिटिश सरकार के सामने आकर उन दिनों जो कुछ भी भारत के साथ हुआ, उसके लिए माफ़ी मांगने का है." ब्रिटेन में भी बहुत सारे लोग औपनिवेशिक काल और उस समय के नेताओं पर सवाल कर रहे हैं. पिछले महीने ब्लैक लाइव्स मैटर प्रोटेस्ट के दौरान मध्य लंदन में चर्चिल की प्रतिमा पर कालिख पोत दी गई. भारतीय इतिहासकार रुद्रांग्शु मुखर्जी कहते हैं, "मैं प्रतिमाओं को गिराने या उनको कालिख पोते जाने के पक्ष में नहीं हूँ. लेकिन मुझे लगता है कि मूर्तियों के नीचे जो विवरण प्लेट होता है, उस पर पूरा इतिहास दर्ज होना चाहिए. चर्चिल दूसरे विश्व युद्ध के नायक थे लेकिन वो 1943 में बंगाल में आए अकाल के दौरान मारे गए लाखों लोगों के लिए भी ज़िम्मेवार थे. मुझे लगता है कि यह ब्रिटेन को भारतीयों और ख़ुद के लिए भी करना चाहिए." ये भी पढ़ें: वह गुप्त मीटिंग जिसमें हिटलर को हराने की योजना बनी अतीत को वर्तमान के मापदंड पर परखने पर हमारी दुनिया में कोई नायक नहीं बचेगा. भारत की आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी पर भी कालों के ख़िलाफ़ राय रखने के आरोप हैं. लेकिन पूरा सच स्वीकार किए आगे बढ़ना भी मुश्किल है. मेरे बचपन की पसंदीदा लेखिका एनिड ब्लॉयटन की किताबों की भी नस्लवादी और सेक्सिस्ट कहकर जमकर आलोचना हुई है. आज एक व्यस्क के रूप में मैं अपने मां-बाप के घर में किसी कोने में पड़ी उन किताबों को जब देखती हूँ तो मुझे वो आरोप सही भी लगते हैं लेकिन क्या मैं उन्हें फेंक दूँ? नहीं. उससे जुड़ी जो ख़ुशनुमा यादें हैं, वो अब मैं जो जानती हूँ उससे अछूती हैं. लेकिन मैं उन किताबों को अपने परिवार में बच्चों को नहीं दूँगी. उनके पास अब कहीं अधिक बराबरी वाली दुनिया की कहानियाँ पढ़ने का अवसर है.

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