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Monday, 20 April 2020

मुर्दों के मसीहा: उन लाशों को दफ़नाने वाले, जिन्हें भारत ने भुला दिया है



मुर्दों के मसीहा: उन लाशों को दफ़नाने वाले, जिन्हें भारत ने भुला दिया है



सरकार ने उन्हें भारत के सबसे उच्चतम नागरिक सम्मानों में से एक, पद्मश्री से नवाज़ा है.

















मोहम्मद शरीफ़ कहते हैं, "पुलिस वालों को लाश फेंकते देख कर मैंने सोचा कि हो सकता है कि उन्होंने इसी तरह मेरे बेटे के शव को भी नदी में फेंक दिया होगा. उसी रोज़ मैंने ख़ुद से कहा कि आज के बाद से मैं ऐसी सभी लाशों का रखवाला बनूंगा, जिन पर किसी का दावा नहीं. जिन्हें कोई नहीं जानता. अब से मैं ऐसी हर लाश का ठीक से अंतिम संस्कार करूंगा.''
भारत में बड़ी तादाद में लावारिस लाशें पायी जाती हैं. इसके कई कारण होते हैं. ये उन लोगों के शव होते हैं जो रेल या सड़क हादसे में अपनी जान गंवा देते हैं. या वो लोग होते हैं जिनकी मौत अपने घर से बहुत दूर हो जाती है. जैसे कि तीर्थयात्री, अप्रवासी, और अपने बच्चों या परिवार से बेदख़ल कर दिए गए बुज़ुर्ग.
कई ग़रीब लोग अस्पताल में मर जाते हैं और फिर उनका अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं होता.
लेकिन, इन लावारिस लोगों के शवों का क्या होता है? 1992 में जब मोहम्मद शरीफ़ के बेटे मोहम्मद रईस की मौत हुई थी, उस समय भारत के कई ज़िलों में मुर्दाघर नहीं हुआ करते थे. ऐसे में इस तरह की लाशों को बड़ी फ़ुर्ती से निपटा दिया जाता था, जिन पर कोई दावा नहीं करता था.
आम तौर पर ऐसी लावारिस लाशों को दफ़नाया जाना चाहिए था. लेकिन, उत्तर भारत में कई जगहों पर पुलिस वाले पैसे बचाने के लिए लावारिस लाशों को नदी में फेंक देते थे. इससे उनके पैसे बचते थे. साथ ही समय भी बच जाता था और लाश को दफ़नाने या जलाने की झंझट से भी निजात मिल जाती थी.





मोहम्मद शरीफ़ के परिवार का बहुत दिनों तक यही मानना था कि उनके बेटे रईस के शव को गोमती नदी में फेंक दिया गया होगा. गोमती नदी, उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से होकर बहती है. मोहम्मद रईस, सुल्तानपुर में ही दवाएं बेचता था. दिसंबर 1992 में हिंदू कट्टरपंथियों ने सोलहवीं सदी में बनी अयोध्या की बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था. मोहम्मद शरीफ़ का घर वहां से क़रीब 65 किलोमीटर दूर है.
मस्जिद ढहाए जाने के बाद जब दंगे भड़के, तो उसी दौरान रईस लापता हो गया था.
मुहम्मद शरीफ़ बताते हैं, "जब मेरा बेटा लापता हो गया तो मैंने क़रीब एक महीने तक उसे हर मुमकिन जगह तलाश किया. मेरी हालत पागलों जैसी हो गई थी. पर वो मुझे कहीं नहीं मिला. मैं उसे खोजने के लिए सुल्तानपुर भी गया था."
फिर वो ख़बर आई, जिसकी आशंका से शरीफ़ का परिवार ख़ौफ़ज़दा था. उनके प्यारे बेटे की मौत हो गई थी. मोहम्मद शरीफ़ और उनकी पत्नी बीबी का रो-रो कर बुरा हाल हो गया. शरीफ़ की पत्नी को तो आज भी बेटे की याद में अवसाद के दौरे पड़ते हैं.
शरीफ़ और उनकी पत्नी की तकलीफ़ इसलिए और भी बढ़ जाती है कि वो अपने बेटे को ठीक से दफ़न भी नहीं कर सके थे. मोहम्मद शरीफ़ कहते हैं कि वो ख़ुदा से मनाते हैं कि जो तकलीफ़ उन्हें हुई, उससे किसी और को न गुज़रना पड़े.
मोहम्मद शरीफ़ कहते हैं कि, "उसी के बाद मैंने तय किया कि मैं किसी भी लावारिस लाश को नदी में नहीं फेंकने दूंगा."
भारत का हिंदू समाज जातियों में बंटा हुआ है. ऐतिहासिक रूप से लाशों को दफ़न करने या जलाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं लोगों पर थोप दी गई है, जो इस जाति व्यवस्था की सबसे निचली पायदान पर हैं. और फिर उन्हें 'अछूत' कह कर उनके साथ और भी बुरा बर्ताव होता है.





लेकिन, साइकिल की मरम्मत करने वाले मोहम्मद शरीफ़ इस चुनौती को स्वीकार करते हुए ज़रा भी परेशान नहीं हुए. उन्होंने पुलिस को अपनी इस ख़्वाहिश के बारे में बताया कि वो उन लाशों की ज़िम्मेदारी लेना चाहते हैं, जिन पर कोई दावा नहीं करता. जिनके अंतिम संस्कार से सब बचना चाहते हैं.
अपने इस काम के शुरुआती दिनों के बारे में मोहम्मद शरीफ़ बताते हैं कि, ''जब मुझे पहली बार लाश उठाने का फ़ोन आया, तो मेरा दिल बड़ी तेज़ी से धड़क रहा था. पोस्ट मॉर्टम के बाद पुलिस ने मुझे लाश को ले जाने को कहा. मुझे अब तक याद है कि उस इंसान की गर्दन कटी हुई थी.''
मगर, जल्दी ही शरीफ़ पर लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार का ये बोझ बढ़ने लगा. जिसके बाद उन्होंने शवों को ढोने के लिए एक चार पहियों वाला ठेला भी ख़रीदा.
उम्मीद के मुताबिक़, शरीफ़ के परिजन, उनके दोस्त और पड़ोसी उनके काम को देख कर सदमे में आ गए थे. मुसलमान होने के बावजूद, मोहम्मद शरीफ़ को वही सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा, जो उनके जैसा काम करने वाले हिंदू भाइयों को झेलना पड़ता था.
मोहम्मद शरीफ़ कहते हैं, ''उस वक़्त मेरे इस काम से मेरे परिवार का कोई भी सदस्य ख़ुश नहीं था. वो कहते थे कि तुम पागल हो गए हो. कई लोग मुझसे डरने लगे थे. उन्हें लगता था कि अगर उन्होंने मुझे छुआ, तो उन्हें कीटाणुओं का संक्रमण हो जाएगा.''
तमाम मुश्किलों के बावजूद, मोहम्मद शरीफ़ अपने इरादे पर अटल थे. उन्होंने इन अनजान लोगों के लिए परिवार की शादियों में, त्यौहारों और यहां तक कि जमात में नमाज़ पढ़ने तक जाना बंद कर दिया था. लेकिन, इस काम को करके मुहम्मद शरीफ़ को सुकून और तसल्ली मिलती थी. हर अंतिम संस्कार के वक़्त उन्हें अपने बेटे रईस की याद आती थी.
शरीफ़ कहते हैं कि, ''ये काम करके मुझे अपने बेटे की मौत की तकलीफ़ से उबरने में मदद मिली. मैं हर वक़्त उसके बारे में सोचता हूं. मुझे उसकी बहुत याद आती है.''
जो काम शरीफ़ कर रहे हैं, वो कोई आसान काम नहीं. पुलिस अक्सर लाश की पहचान करने में मुश्किलों का सामना करती है. इसका मतलब ये होता है कि लाश कई दिनों तक यूं ही रखी रहती है. मोहम्मद शरीफ़ कहते हैं कि अक्सर उन्हें लाश से नहीं, पर उसकी दुर्गंध से बहुत परेशानी होती है.
वो बताते हैं कि, ''जब मैं बुरी तरह क्षत-विक्षत या सड़ा हुआ शव देखता हूं, तो मेरी नींद उड़ जाती है. सोना मुश्किल हो जाता है. मुझे बुरे ख़्वाब आते हैं. फिर सोने के लिए मुझे नींद की गोलियां लेनी पड़ती हैं."
शरीफ़ कहते हैं कि, "कई बार पुलिसवाले मेरे साथ क़ब्रिस्तान या श्मशान घाट आते हैं. लेकिन, वो भी लाशों से दूर ही रहते हैं."
इन मुश्किलों के बावजूद मोहम्मद शरीफ़ हर लाश का सही तरीक़े से अंतिम संस्कार करते हैं. अक्सर वो शव को नहलाते-धुलाते हैं.
अगर मोहम्मद शरीफ़ को ये पता लगता है कि वो किसी मुसलमान की लाश है, तो वो उसे कफ़न में लपेट कर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ते हैं. और अगर वो किसी हिंदू की लाश होती है, तो उसका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से करते हैं.
किसी को भी ये नहीं मालूम कि अब तक मोहम्मद शरीफ़ ने कितनी लाशों का अंतिम संस्कार किया है. उन्हें दफ़नाया है. अयोध्या ज़िला प्रशासन के प्रमुख अनुज कुमार झा ने बीबीसी को बताया कि उनके पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि मुहम्मद शरीफ़ को कितनी लाशें, अंतिम संस्कार के लिए सौंपी गईं.
अयोध्या के डीएम, अनुज कुमार झा कहते हैं, "हमारा अंदाज़ा है कि हमने शरीफ़ को क़रीब ढाई हज़ार शव अंतिम संस्कार करने के लिए दिए होंगे."
वहीं, मोहम्मद शरीफ़ का परिवार कहता है कि उन्होंने अब तक साढ़े पाँच हज़ार से ज़्यादा लाशों का अंतिम संस्कार किया होगा.
लेकिन, पिछले कई बरस से मोहम्मद शरीफ़ ये काम बिना किसी आर्थिक मदद के कर रहे हैं. आज भी वो अपनी साइकिल की मरम्मत की दुकान में काम करते हैं. और रोज़ाना क़रीब दो-ढाई सौ रुपए कमाते हैं.
लेकिन, अब हालात बदल रहे हैं. अब मोहम्मद शरीफ़ को उनके समर्पण के लिए पहचान मिल रही है. सरकार ने उन्हें भारत के सबसे उच्चतम नागरिक सम्मानों में से एक, पद्मश्री से नवाज़ा है. अब लाशों के अंतिम संस्कार का ख़र्च उठाने में स्थानीय दुकानदार भी उन्हें मदद करते हैं. अस्सी बरस की उम्र में अब शरीफ़ ने अपनी इस ज़िम्मेदारी का बोझ उठाने के लिए दो सहायक भी रख लिए हैं, जिन्हें वो पैसे भी देते हैं.
शरीफ़ बताते हैं कि, 'हिंदू और मुसलमान, दोनों ही मेरी मदद करते हैं. लोग मुझे खाना और गर्म कंबल देते हैं. हाल ही में मेरी आंख का ऑपरेशन हुआ था. एक अपरिचित व्यक्ति ने मुझे फ़ोन किया और बीस हज़ार रुपए दिए.'
लेकिन, उम्र के इस पड़ाव पर भी शरीफ़ इस काम से रिटायर होने के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रहे हैं. न तो उनके दो बचे हुए बेटे और न ही उनके नाती-पोते उनके इस काम को अपनाना चाहते हैं. और शरीफ़ को इस बात का अच्छे से अंदाज़ा है कि अगर उन्होंने लावारिस लाशों को दफ़नाना बंद कर दिया, तो क्या होगा.
वो कहते हैं, "अगर मैं ये काम नहीं करूंगा, तो पुलिस पहले की तरह लावारिस लाशों को नदी में फेंक दिया करेगी."
और 'गुज़र गए लोगों के उद्धारक' कहे जाने वाले मोहम्मद शरीफ़ के लिए ये बात नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त होगी.
वो कहते हैं कि, "मैं अपनी आख़िरी सांस तक ये काम करना जारी रखूंगा."













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