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Tuesday, 28 April 2020

स्पैनिश फ़्लू: भारत में जब दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ गई थीं... 1918



From BBC Tuesday 28.04.2020... 17:00  HRS...

https://www.bbc.com/hindi/india-52456512

















स्पैनिश फ़्लू: भारत में जब दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ गई थीं.....1918


1918 में हिंदी के मशहूर कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 22 साल के रहे होंगे.
उन्होंने अपनी आत्मकथा कुल्ली भाट में लिखा था- मैं दालमऊ में गंगा के तट पर खड़ा था. जहाँ तक नज़र जाती थी गंगा के पानी में इंसानी लाशें ही लाशें दिखाई देती थीं. मेरे ससुराल से ख़बर आई कि मेरी पत्नी मनोहरा देवी भी चल बसी हैं. मेरे भाई का सबसे बड़ा बेटा जो 15 साल का था और मेरी एक साल की बेटी ने भी दम तोड़ दिया था. मेरे परिवार के और भी कई लोग हमेशा के लिए जाते रहे थे. लोगों के दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ कम पड़ गई थीं. पलक झपकते ही मेरी परिवार मेरी आँखो के सामने से ग़ायब हो गया था. मुझे अपने चारों तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई देता था. अख़बारों से पता चला था कि ये सब एक बड़ी महामारी के शिकार हुए थे.

महात्मा गाँधी और प्रेमचंद भी हुए स्पैनिश फ़्लू से पीड़ित

निराला का परिवार ही नहीं भारत को आज़ादी दिलाने वाले महात्मा गाँधी भी लाखों लोगों की तरह इस जानलेवा बीमारी स्पैनिश फ़्लू के शिकार हो गए थे.
गाँधी की पुत्रवधु गुलाब और पोते शांति की मौत भी इस बीमारी से हुई थी. अगर गाँधी इस बीमारी से न ठीक हुए होते तो शायद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास दूसरे ही ढ़ंग से लिखा जाता.
इस महामारी ने क़रीब एक करोड़ 80 लाख भारतीय लोगों की जान ले ली थी. कहा ये भी जाता है कि मशहूर उपन्यासकार प्रेमचंद भी इस बीमारी से संक्रमित हुए थे.



इतिहास के पन्नों में इसकी इतनी चर्चा नहीं होती लेकिन इस महामारी के कारण ही ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ लोगों का रोष आसमान छूता चला गया था.
इस बीमारी की शुरुआत 29 मई, 1918 को हुई थी जब पहले विश्व युद्ध के मोर्चे से लौट रहे भारतीय सैनिकों का जहाज़ बंबई बंदरगाह पर आकर लगा था और करीब 48 घंटों तक वहाँ लंगर डाले खड़ा था.




मेडिकल इतिहासकार और 'राइडिंग द टाइगर' पुस्तक के लेखक अमित कपूर लिखते हैं, "10 जून, 1918 को पुलिस के सात सिपाहियों को जो बंदरगाह पर तैनात थे, नज़ले और ज़ुकाम की शिकायत पर अस्पताल में दाखिल कराया गया था. ये भारत में संक्रामक बीमारी स्पैनिश फ़्लू का पहला मामला था. तब तक ये बीमारी पूरी दुनिया में फैल चुकी थी."
एक अनुमान है कि इस बीमारी से पूरी दुनिया में 10 से 20 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. जॉन बैरी अपनी किताब 'द ग्रेट इनफ़्लुएंज़ा - द एपिक स्टोरी ऑफ़ द डेडलिएस्ट पेंडेमिक इन हिस्ट्री' में लिखते हैं, ''साढ़े 10 करोड़ की आबादी वाले अमरीका में इस बीमारी से क़रीब 6 लाख 75 हज़ार लोग मारे गए थे. 1918 में इस बीमारी से पूरी दुनिया में इतने लोग मर चुके थे जितने पहले किसी बीमारी से नहीं मरे थे. 13वीं सदी में फैली ब्यूबोनिक प्लेग में यूरोप की 25 फ़़ीसदी आबादी ज़रूर ख़त्म हो गई थी लेकिन तब भी 1918 में फैले स्पैनिश फ़्लू से मरने वालों की संख्या उससे भी अधिक थी.''

दर्दनाक मौतें

जॉन बैरी आगे लिखते हैं, '1918 की महामारी में 24 हफ़्तों में जितने लोग मारे गए थे उतने एड्स से 24 सालों में नहीं मरे हैं. इस बीमारी का सबसे अधिक असर पीड़ित के फेफड़ों पर पड़ता था. उनको असहनीय खाँसी हो जाती थी और उनकी नाक और कभी कभी कान और मुँह से ख़ून बहने लगता था. पूरे शरीर में इतना दर्द होता था कि लगता था कि सारी हड्डियाँ टूट जाएंगी. मरीज़ की खाल का रंग पहले नीला, फिर बैंगनी और अंत में काला हो जाता था. अमरीका में फ़िलाडेल्फ़िया में आलम ये था कि पादरी घोड़े पर सवार होकर घर घर जाते थे और लोगों से कहते थे कि अपने घर के दरवाज़े खोल कर अंदर रखे शवों को उनके हवाले कर दें. वो उस अंदाज़ में आवाजें लगाते थे जैसे आजकल कबाड़ीवाले घर घर जाकर पुकारते हैं.
'शुरू में जब ये बीमारी फैली तो दुनिया भर की सरकारों ने इसे इसलिए छिपाया कि इससे मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों का मनोबल गिर जाएगा. सबसे पहले स्पेन ने इस बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार किया. इसलिए इसे स्पैनिश फ़्लू का नाम दिया गया.


रेल से हुआ पूरे भारत में फैलाव

बंबई में तो ये बीमारी फैली ही, भारतीय रेल इसे भारत के दूसरे हिस्सों में ले गई. 1920 समाप्त होते होते पूरी दुनिया में इस बीमारी से पाँच से दस करोड़ करोड़ लोग मर चुके थे, दोनों विश्वयुद्धों में कुल मिलाकर हुई मौतों से भी ज़्यादा.
भारत में सबसे अधिक क़रीब 1 करोड़ 80 लाख लोग यानी उस समय की जनसंख्या का 6 फ़ीसदी. कश्मीर की ऊँचाइयों से लेकर बंगाल के गाँव तक कोई भी इस बीमारी से अछूते नहीं रहे थे.
जॉन बेरी ने अपनी किताब में भारत में इस बीमारी के फैलाव का ब्यौरा देते हुए लिखा है, 'भारत में लोग ट्रेनों में अच्छे-भले सवार हुए. जब तक वो अपने गंतव्य तक पहुंचते वो या तो मर चुके थे या मरने की कगार पर थे. बंबई में एक दिन 6 अक्तूबर, 1918 को 768 लोगों की मौत हुई थीं. दिल्ली के एक अस्पताल में इनफ़्लुएंज़ा के 13190 मरीज़ भर्ती किए गए जिनमें से 7044 की मौत हो गई.'


महिलाओं पर अधिक असर

ब्रिटेन में जहाँ इस बीमारी से मृत्यु दर 4.4 प्रति हज़ार थी भारत में ये दर 20.6 प्रति हज़ार थी. भारत में हालत इसलिए और भी ख़राब थी क्योंकि उसी समय भारत में इतिहास का सबसे भयानक सूखा पड़ा था.
भूख से शरीर की आरोग्य क्षमता कम हो जाती है, इसलिए ये फ़्लू भारतवासियों के लिए और घातक साबित हो रहा था. एक और ध्यान देने योग्य बात ये थी कि पूरे देश में पुरुषों की तुलना में औरतें इस बीमारी की अधिक शिकार हो रही थीं.
शायद इसका कारण ये रहा हो कि महिलाओं को भारतीय समाज में पुरुषों की तुलना में कम खाने को मिलता हो. दूसरे औरते ही बीमारों की तीमारदारी कर रही थी, इसलिए उनको ये बीमारी जल्दी पकड़ रही थी.



शून्य से भी नीचे विकास दर

भारत के 120 साल के आर्थिक इतिहास में 1918 का साल सबसे बुरा साल था. भारत की विकास दर शून्य से कहीं नीचे 10.8 फ़ीसदी चली गई और मुद्रा स्फीति ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए.
इस बीमारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बंगाल के सूखे और विश्व युद्ध से भी कहीँ अधिक प्रभावित किया. भारत की जनगणना के इतिहास में सिर्फ़ एक बार 1911-1021 में हुआ है कि देश की जनसंख्या पिछले दस वर्षों की तुलना में कम हुई हो.
ये कहना शायद ग़लत नही होगा कि इसमें सबसे बड़ी भूमिका स्पैनिश फ़्लू की थी. मार्च 1920 आते-आते इस बीमारी पर नियंत्रण पा लिया गया था.



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