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Friday, 15 May 2020

NEWS ON CORONA VIRUS



FROM BBC, TIMES OF INDIA, REUTERS, NEW YORK TIMES,


https://www.bbc.com/hindi/india-52667516






सड़क किनारे मां बनी मज़दूर औरत, थोड़ी देर सुस्ताकर फिर पैदल चल घर पहुंची


सिर पर सामान की गठरी, गोद में दो साल की बच्ची और उसके पीछे तीन और छोटे बच्चे जिनमें सबसे बड़ा सात साल का है. ये शंकुतला और राकेश का परिवार है जो पैदल ही महाराष्ट्र के नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए रवाना हुआ.
ऐसे हज़ारों मज़दूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे. फ़र्क ये था कि शकुंतला गर्भवती थीं. गर्भ का नौवां महीना शुरू हो चुका था और रास्ता बहुत लंबा था.
जहां ये परिवार काम करता था वहां अन्न का एक दाना नहीं बचा था और चार बच्चों को खाना खिलाने के लाले पड़ चुके थे. दिहाड़ी मज़दूरी का काम करने वाले राकेश को एक दिन के 400 रुपये और शकुंतला को 300 रुपये मिलते थे.
कोरोना वायरस के कारण लगे लॉकडॉउन को एक महीने से ज़्यादा हो चला था और इसके खुलने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं नज़र आ रहे थे.

'कोई रास्ता नहीं रहा तो चल पड़े'

नासिक से गांव के कुछ और मज़दूर लौट रहे थे. गांव लौटने वाली ये दूसरी टोली थी. शकुंतला और उनके पति राकेश ने परिस्थितियों के सामने हार मानते हुए इसी टोली के साथ पैदल ही अपने गांव उचेहरा लौटने के लिए हामी भर दी.


शकुंतला बताती हैं, “मुझे लगा था कि 10-15 दिन में बच्चा होगा. इतना नहीं सोचा था कि बच्चा होने वाला है. खाने-पीने का सामान सब ख़त्म हो गया था. बस हम तो किस्मत पर छोड़कर चल दिए कि अब जो होगा भगवान भरोसे है.”
राकेश बताते हैं, ''हम सुबह चले और रास्ते में हमें लोग बिस्किट, खाने का सामान और पानी दे देते थे और हम चलते रहते थे. हमारे साथ महिला और पुरुष मिलाकर पैदल 18 लोगों की टोली थी. साथ में उनके बच्चे थे. हम लोग लगभग 60 किलोमीटर चले होगें और शाम होने लगी थी. मेरी पत्नी ने दर्द की शिकायत की और कहा कि लगता है बच्चा पैदा होने वाला है. लेकिन ना वहां कोई अस्पताल था, ना नर्स और ना कोई दाई.''
कई मुश्किलों से जूझता ये परिवार बीच रास्ते में था कि उसके सामने एक और चुनौती आ गई.

'बच्चा घर में हो या बाहर, हमारे लिए एक ही बात'

शकुंतला बताती हैं, “इस टोली में मौजूद महिलाएं मुझे सड़क किनारे पेड़ के नीचे ले गईं और जल्दी ही मेरी बच्ची हो गई. बच्ची की नाल महिलाओं ने कैंची से काट दी और उसे साड़ी से साफ़ कर के मुझे दे दिया. हम लोगों ने क़रीब एक घंटा आराम किया और फिर चलना शुरू कर दिया.”
लेकिन क्या डर नहीं लगा कि बच्ची को कुछ हो जाता या आपकी जान को ख़तरा हो जाता तो?
इस सवाल पर शकुंतला ने कहा, “मेरे चार बच्चे भूखे मर रहे थे. ग़रीब मेहनत नहीं करेगा तो कैसे कमाएगा? बच्चा घर पर होता या बाहर हमारे लिए तो ये एक ही बात है.“
हालांकि, पति राकेश का कहना था कि वो डर गए थे कि अगर मां को कुछ हो जाता तो चार बच्चों का क्या होता. अब उन्हें इस बात का दिलासा है कि मां-बच्चा दोनों ठीक हैं.


'पत्नी थक जाती, उसे हिम्मत बंधाता रहा..'

राकेश बताते हैं, ''बच्ची होने के बाद जब हम चल रहे थे तो कई बार शकुंतला ने कहा कि बहुत थक गई है और अब चला नहीं जा रहा है लेकिन मैं उसे हिम्मत बंधाता और धीरे-धीरे चलने के लिए कहता. इसके बाद हम क़रीब 150 किलोमीटर और चले और हम से चेकपॉइंट पर पूछताछ हुई. लोगों ने बताया कि इस टोली में एक महिला भी है जिसने नवजात को जन्म दिया है. तब हमें रात में एक कॉलेज में ठहराया गया."
बच्ची को जन्म देने के बाद शकुंतला 150 किलोमीटर पैदल चलीं तब जाकर परिवार महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश सीमा से लगे क्षेत्र बिजावन पहुंचा.
ज़िला सतना में ब्लॉक मेडिकल ऑफ़िसर एके राय का कहना है, “हमें ये सूचना मिली थी कि मज़दूरों की एक टोली नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए चली है. हमें ये भी जानकारी मिली थी कि उसमें एक गर्भवती महिला भी है और हम इस टोली के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे. ये महिला क़रीब 60 किलोमीटर चली होंगी कि प्रसव पीड़ा शुरू हो गई और इस टोली में मौजूद महिलाओं की मदद से इसने एक बच्ची को जन्म दिया.”
एके राय का कहना है कि वो ख़ुद वहां जननी सुरक्षा सेवा की गाड़ी के साथ गए.
वो बताते हैं, ''शकुंतला गोद में बच्ची को लेकर बहुत बहादुरी के साथ खड़ी हुई थीं. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. उन्होंने पूरी जांच करवाई और कोविड टेस्ट भी कराया. बच्चे को जन्म के बाद दिए जाने वाले सभी टीके दिये जा चुके हैं. शकुंतला का हिमोग्लोबिन 9.8 है. उन्हें विटामिन और अन्य सप्लीमेंट्स दिए गए हैं. फ़िलहाल, जच्चा-बच्चा स्वस्थ हैं और उन्हें छुट्टी दे दी गई है.
ज़िला कलेक्टर ने भी परिवार को 10 हज़ार रुपये और खाने-पीने का सामान दिया है.


17 migrant labourers killed, 93 injured in accidents in 24 h .. 

Read more at:
http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/75748597.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst





https://www.bbc.com/hindi/india-52668118

विरोध करने वाले यात्रियों का क्या होगा?

इन होटलों की लिस्ट यात्रियों को रेलवे स्टेशनों, एयरपोर्ट और हाईवे के एंट्री पॉइंट पर उपलब्ध होती है. क्वारंटीन पर जाने का ख़र्च यात्रियों को ही वहन करना होगा.
मंत्री सुरेश कुमार ने कहा, "हमने उन्हें समझाने की कोशिश की कि नियमों को नहीं तोड़ा जा सकता. उनमें से कुछ लोग वापस दिल्ली जाना चाहते थे तो हमने उनके लिए एक अलग कोच की व्यवस्था कर दी."
तो क्या आगे भी सरकार ऐसे ही विरोध करने वालों के लिए कोच की व्यवस्था करेगी?
ये पूछे जाने पर मंत्री ने बताया, "ये ऐसी पहली घटना है. हम व्यवस्था को बेहतर करेंगे. जो वेटिंग लिस्ट में हैं उनके नंबर पहले से लेकर हर यात्री को संदेश भेजेंगे और उनके ट्रेन पर चढ़ने से पहले रेलवे स्टेशन पर घोषणाएँ करते रहेंगे."
इस तरह से दूसरे राज्यों से आए लोगों को क्वारंटीन पर भेजने का ये नियम सरकार ने ये सोचकर बनाया है क्योंकि घरों में क्वारंटीन पर भेजे जाने की बात कर कई लोगों ने इसका पालन नहीं किया.








केंद्र सरकार ने सात मई को एक आदेश जारी किया था जिसमें कहा गया कि पाँच हाई-रिस्क राज्यों - दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु - से दूसरे राज्यों में जाने वाले लोगों को 14 दिन के अनिवार्य क्वारंटीन पर जाना होगा.




https://www.bbc.com/hindi/international-52662809

कोरोना वायरस के अलावा 'दुनिया के ग़ुस्से' से कैसे निपट रहा है चीन


एक समय था जब चीन की विदेश नीति बेहद सोची-समझी और रहस्यपूर्ण हुआ करती थी.
अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंगर ने कूटनीति पर अपने एक मौलिक अध्ययन में लिखा है, "बीजिंग की कूटनीति इतनी सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष थी कि वॉशिंगटन में यह अधिकांशत: हमारे पल्ले नहीं पड़ती थी."
पश्चिमी दुनिया की अधिकांश सरकारें अपने यहां चीनी भाषा के ऐसे जानकार को नियुक्त करती हैं जिनका काम होता है चीनी पोलित ब्यूरो की बैठकों के संकेतों को समझना.
पूर्ववर्ती नेता डेंग शिआयोपिंग के समय चीन की घोषित नीति "अपनी क्षमता छिपाने और अपनी बारी का इंतज़ार करने की" होती थी लेकिन अब इसमें बदलाव आ चुका है.
चीन ने अब दुनिया भर के देशों में कहीं ज़्यादा मुखर राजनयिकों को तैनात किया है जो सोशल मीडिया पर बेबाकी से अपनी बात रखते हैं. उनकी बेबाकी कई बार अचरज भी डालने वाली होती है.

गर्म होती चीनी कूटनीति

'वुल्फ़ वॉरियर' और 'वुल्फ़ वॉरियर-2' बेहद पॉपुलर फिल्में हैं जिसमें चीन की एलीट स्पेशल फ़ोर्स अमरीकी नेतृत्व वाले भाड़े के सैनिकों और दूसरे लोगों से टक्कर लेती है. इसमें चीनी स्पेशल फ़ोर्स के लोग हिंसक और कट्टरता की हद तक राष्ट्रवादी दिखाई देते हैं.
एक आलोचक की नज़र में ये "चीनी ख़ासियतों से भरे रैम्बो" हैं. एक प्रोमोशनल पोस्टर में मुख्य किरदार अपनी मिडिल फ़िंगर को उठाते हुए कहता है, "जो चीन को नुक़सान पहुंचाएगा, वह चाहे कितना भी दूर क्यों नहीं हो, नष्ट कर दिया जाएगा."
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में हालिया प्रकाशित संपादकीय में कहा गया है चीनी लोग नरम लहज़े वाले कूटनीतिक भाषा शैली से संतुष्ट नहीं थे. इस संपादकीय में कहा गया है कि चीन के नए 'वुल्फ़ वॉरियर्स डिप्लोमेसी' की आंच पश्चिमी देशों को महसूस होने लगी है.

सोशल मीडिया पर सक्रियता और आक्रामकता

चीन के 'वुल्फ़ वॉरियर्स' में सबसे बेहतरीन चीन के विदेशी मंत्रालय के युवा प्रवक्ता लिजियान झाओ हैं. वो ऐसे अधिकारी हैं जिन्होंने दावा किया था कि वुहान में कोरोना वायरस अमरीका लेकर आया है. हालांकि इस दावे के पक्ष में उन्होंने अब तक कोई साक्ष्य नहीं रखे हैं.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्विटर पर इनके छह लाख से ज़्यादा फ़ॉलोअर्स हैं और वो अपने फ़ॉलोअर्स के लिए हर घंटे एक्टिव नज़र आते हैं. वो चीन के बचाव में और चीन को प्रमोट करने के लिए लगातार ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं या लाइक का बटन दबाते हैं.
दुनिया भर में कहीं भी तैनात राजनयिकों को यही करना चाहिए. अपने देश के राष्ट्रीय हितों को प्रमोट करना उनका काम है लेकिन कुछ राजनयिक ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे कूटनीतिक नहीं कहा जा सकता.
भारत में मौजूद चीनी दूतावास को ही देखिए. भारत में मौजूद चीनी राजनयिक ने कहा है कि "वायरस फैलाने के लिए चीन से मुआवज़े की मांग हास्यास्पद और ध्यान खींचने की बेकार कोशिश है."

नीदरलैंड्स में मौजूद चीनी राजदूत ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी नस्लीय भेदभाव से भरे होने का आरोप लगाया है.
ट्रंप ने वायरस पर अंकुश पाने के कई तरीकों के बारे में अनुमान लगाया था जिस कारण दुनिया भर में ट्रंप की काफी आलोचना हुई.


लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता ने ट्वीट कर कहा, "ट्रंप बिल्कुल सही हैं. कुछ लोगों को कीटनाशक के इंजेक्शन लगाने चाहिए या फिर उससे गरारे करवाने चाहिए. इससे कम से कम वो वायरस, झूठ और घृणा तो नहीं फैलाएंगे. "
लंदन में चीन की 'वुल्फ़ वॉरियर' मा हुए हैं. वो लंदन स्थित चीनी दूतावास में नंबर तीन अधिकारी हैं. उनके ट्वीटर यूज़रनेम में 'वॉरहॉर्स' का इस्तेमाल किया है. वो जितने विलक्षण हैं, उतने ही मज़बूत भी.
उन्होंने ट्वीट किया है, "कुछ अमरीकी नेताओं को झूठ बोलने, ग़लतबयानी करने, दोषारोपण करने और दूसरों को कलंकित करने के लिए इतना नीचे नहीं गिरना चाहिए. लेकिन हम नीचता की होड़ लगाने के लिए अपना स्तर नहीं गिराएंगे. वो नैतिकता और इंटेग्रिटी की परवाह नहीं करते लेकिन हम करते हैं. हम उनकी मूर्खता के ख़िलाफ़ भी लड़ सकते हैं."

यह काफी हद तक सोशल मीडिया पर चलने वाले आरोप-प्रत्यारोप और शब्दों के घमासान जैसा ही है. लेकिन चीन के लिहाज़ से यह बहुत बड़ा बदलाव है.
जर्मन मार्शल फ़ंड थिंक टैंक की एक रिसर्च के मुताबिक़ बीते एक साल में चीन के आधिकारिक ट्विटर एकाउंटस में 300 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है, जबकि सोशल मीडिया पोस्ट चार गुना अधिक किए जा रहे हैं.
जर्मन मार्शल फंड की सीनियर फ़ेलो क्रिस्टिन बेरज़िना ने बताया, "चीन से जो हम उम्मीद करते हैं उससे यह बिल्कुल उलट है. अतीत में चीन सार्वजनिक तौर पर अपने देश की पॉज़िटिव इमेज बनाने की कोशिश करता था. दोस्ताना संबंधों को बढ़ावा दिया जाता था. सरकारी नीतियों पर कठोरता से बात करने की बजाय लोग क्यूट पांडा के वीडियो शेयर किया करते थे. इस लिहाज़ से यह एक बड़ा बदलाव है."
निश्चित तौर पर यह नीतिगत बदलाव चीन के अधिकारियों का ही चुनाव है.
चीनी अधिकारी चाहते तो वो अपने सूचना अभियान को पूरी तरह से ढंके-छिपे अंदाज़ की कूटनीति से भी चला सकते थे जिसमें दुनिया भर के देशों को प्रोटेक्टिव मेडिकल किट का दान और उसकी बिक्री शामिल होती है.
इस तरह चीन खुद को सॉफ़्ट पावर के तौर पर प्रमोट कर सकता था. लेकिन इस 'हेल्थ सिल्क रोड' नीति के ज़रिए हासिल किए गुडविल पर 'वुल्फ़ वॉरियर्स' की आक्रामकता कहीं ज्यादा भारी प्रतीत हो रही है.

धमकी देते चीनी राजदूत

ऑस्ट्रलिया में मौजूद चीनी राजदूत चेंग जिन्ग्ये अपने मेहमानों से संघर्ष में लगे हुए हैं. ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने जब कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जांच करने के लिए स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच को समर्थन देने की बात की तब चेंग जिन्ग्ये ने संकेत दिया कि चीन ऑस्ट्रेलियाई उत्पादों का बॉयकॉट कर सकता है.
एक इंटरव्यू में उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई फ़ाइनेंशियल रिव्यू से कहा, "आम लोग भी तो कह सकते हैं कि हम क्यों ऑस्ट्रेलियाई शराब पिएं या ऑस्ट्रेलियाई बीफ़ खाएं?"
ऑस्ट्रेलियाई मंत्रियों ने चीन पर आर्थिक दादागिरी करने की धमकी देने का आरोप लगाया.
ऑस्ट्रेलिया के विदेश और कारोबार मंत्रालय ने राजदूत को अपना पक्ष रखने के लिए तलब किया. इसके जवाब में चीनी राजनयिक ने दूतावास की वेबसाइट पर बातचीत का एक हिस्सा प्रकाशित किया है जिसमें वे ऑस्ट्रेलिया से राजनीतिक खेल खेलना बंद करने की अपील कर रहे हैं.
चीन ने इसी सप्ताह ऑस्ट्रेलियाई बीफ़ प्रोसेस करने वालों से आयात पर पाबंदी लगाई है और ऑस्ट्रेलियाई बार्ली पर शुल्क बढ़ाने की भी धमकी दी है.


इस आक्रामकता के ख़तरे

पैरिस में चीन के राजदूत लु शाये को फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने तलब किया. दरअसल पैरिस में चीनी दूतावास ने अपनी वेबसाइट पर टिप्पणी प्रकाशित की थी कि फ़्रांस ने अपने बुज़ुर्गों को कोविड-19 से मरने के लिए केयर होम्स में छोड़ दिया है. लु को इस कमेंट पर अपना पक्ष रखने के लिए तलब किया गया था.
चीनी राजनयिकों को सबसे कड़ी प्रतिक्रिया अफ्ऱीका में देखने को मिली है, जहां नाइजीरिया, कीनिया, यूगांडा, घाना और अफ्ऱीकी यूनियन में तैनात चीनी राजदूतों को उनके संबंधित मेहमान देशों ने तलब करके हाल के सप्ताह में चीन के अंदर अफ्ऱीकी लोगों के साथ नस्लीय आधार पर भेदभाव का मसला उठाया है.
नाइजीरिया के हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव के स्पीकर फ़ेमी गाबाजाबियमिला ने चीनी राजदूत के साथ जताई गई अपनी आपत्ति वाला वीडियो प्रकाशित किया है.
फ़ॉरेन अफे़यर्स पत्रिका में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रड ने एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा कि चीन को अपनी नई रणनीति की क़ीमत चुकानी होगी.
उन्होंने लिखा है, "चीन के 'वुल्फ़ वॉरियर्स' राजनियक चीन में चाहे जो भी रिपोर्ट करते हों लेकिन वास्तविकता में चीन की छवि को काफी नुक़सान पहुंच रहा है (दुर्भाग्य यह है कि 'वुल्फ़ वॉरियर्स' उसे ठीक करने की जगह और नुक़सान पहुंचा रहे हैं)."

केविन रड ने यह भी लिखा कि, "कोरोना वायरस के प्रसार को लेकर दुनिया भर में चीन विरोधी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. चीन पर नस्लीय भेदभाव वाले आरोप भारत, इंडोनेशिया और ईरान जैसे देशों में भी लगे हैं. चीन सॉफ़्ट पावर की छवि तार-तार होने का ख़तरा उत्पन्न हो गया है."


पश्चिमी देश करेंगे किनारा?

कूटनीतिक स्तर पर चीन की दृढ़ता से ख़तरा यह भी पश्चिमी दुनिया उससे किनारा कर सकते हैं. उनका चीन पर अविश्वास बढ़ सकता है और वो चीन से संबंध बढ़ाने की कोशिश नहीं करेंगे.
अमरीका के आगामी राष्ट्रपति चुनाव के लिए चीन एक मुद्दा बन चुका है. इस बार दोनों उम्मीदवार एक दूसरे को कड़ी चुनौती दे रहे हैं.
ब्रिटेन में भी, कंज़रवेटिव पार्टी के प्रतिनिधियों ने चीनी नीतियों की गंभीर समीक्षा की शुरुआत कर रहे हैं.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कूटनीतिक तनावों से चीन और पश्चिमी देशों के बीच तनाव और बढ़ेगा. इस वक़्त तनाव बढ़ने के ख़तरे का केवल एक पक्ष नहीं क्योंकि मौजूदा संकट के समय दुनिया भर में आपसी सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत है.

चीन का यही रवैया रहा तो क्या होगा?

अगर शॉर्ट टर्म में देखें तो कोविड-19 को लेकर रिसर्च, टेस्टिंग, वैक्सीन की तलाश और उसका वितरण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की ज़रूरत होगी. इस काम में चीन की भी ज़रूरत होगी.
लेकिन लंबे समय के परिप्रेक्ष्य में दुनिया भर के विश्लेषकों का मानना है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए वैश्वक स्तर पर मिल कर काम करने की ज़रूरत होगी. हालांकि ऐसा होने की उम्मीद बहुत कम ही दिख रही है.
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में चाइना पावर प्रोजेक्ट के निदेशक बोनी ग्लेसर ने कहा, "अगर वैश्विक महामारी के इस समय में अमरीका और चीन अपने मतभेदों को बुलाकर एक साथ संघर्ष नहीं कर सकते तो फिर दोनों अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक साथ आएंगे, इस पर विश्वास करना कठिन है."
कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिमी देश इस महामारी के बाद चीन से अलग रणनीतिक तौर पर अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ते हैं तो भी एक नए तरह के आपसी सहयोग का फ्ऱेमवर्क तैयार करना होगा.
चीन की 'वुल्फ़ वॉरियर्स' कूटनीति इसे इतनी आसानी से नहीं होने देगी.





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