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Monday, 13 September 2010

બંધારણની કલમ ૩૭૦

મીત્રો,

આજ કાલ બંધારણની કલમ ૩૭૦નો ઉલ્લેખ રોજે રોજ આવે છે. હકીકતમાં ૩૬૯ પછીની ઘણી કલમો કામ ચલાઉ એટલેકે ટેમ્પરરી છે. બંધારણમાં એવી કેટલીયે કલમો છે જેનો પ્રથમ દીવસથી અમલ થયો હોવા છતાં એના અમલ માટે આજ દીવસ સુધી અલગ અલગ કાયદા કે કોર્ટ બનતી જાય છે.

દાખલા તરીકે આભળછેટ બંધારણથી દુર થઈ પણ એની અસર આજ દીવસ સુધી ચાલુ છે. મહારાષ્ટ્રમાં ૩-૪ દીવસ પહેલાં હમણાં જ નક્કી થયું છે કે એટ્રોસીટી આટકાવવા માટે વધારાની કોર્ટો બને. એટલે કે બંધારણનો અમલ થતો નથી એ ચોક્કસ છે.

શીક્ષણના અધીકાર બાબત પણ ૫૦-૬૦ વર્ષ ચર્ચા ચાલુ હતી. અનુસુચીત જાતી જમાતી બાબત તો કેટલીયે ચર્ચા થાય છે અને હજી ૫૦-૬૦ વર્ષ ચાલશે.

એવી જ આ કલમ ૩૭૦ છે. આ કલમને દુર કરવા માટે ઘણાં સમયથી જોરથી ચર્ચા ચાલે છે અને હોઈ શકે એને કોઈક ચુંટણીનો મુદ્દો પણ બનાવે.

આ દેશમાં લોક તંત્ર છે અને લોકોથી રાજ ચાલે છે. કોંગ્રેસ હમેશાં લઘુમતીઓનો સહારો લઈ સરકાર બનાવે છે અને જેવો આ કલમ ૩૭૦ને કોઈક મુદ્દો બનાવશે કે જોરથી ચર્ચા થશે જુઓ દલીતોના અત્યાચાર અટકતા નથી અને નવરા નવું ગતકડું ૩૭૦નું લઈ આવ્યા.

3 comments:

  1. http://www.bhaskar.com/article/ABH-tips-on-kashmir-3319665.html

    कश्मीर पर सुझाव
    Source: Bhaskar news | Last Updated 00:02(26/05/12)

    संपादकीय.. कश्मीर मसले पर नियुक्त वार्ताकारों के दल की रिपोर्ट के बारे में एक सिरे पर भाजपा और दूसरे पर हुर्रियत कांफ्रेंस की प्रतिक्रिया अपेक्षित दिशा में ही है। चूंकि भाजपा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को खत्म करना चाहती है और दूसरी तरफ हुर्रियत कांफ्रेंस कश्मीर को भारत के अभिन्न अंग के रूप में नहीं देखती, इसलिए उनका उस रिपोर्ट से असहमत होना स्वाभाविक है, जिसका सारांश यह है कि संविधान की धारा 370 पर उसकी मूल भावना के मुताबिक अमल हो।


    कश्मीर मसले के स्थायी हल के लिए वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर और पाक कब्जे वाले कश्मीर के लोगों के बीच संबंध एवं संपर्को को बाधा मुक्त बनाने का सुझाव दिया है। भाजपा ने उचित ही इसका यह निष्कर्ष निकाला है कि वार्ताकार कश्मीर की विभाजित यथास्थिति स्वीकार कर लेने के पक्ष में हैं, जिसे कतई मंजूर नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ वार्ताकारों - दिलीप पडगांवकर, एमएस अंसारी और राधा कुमार ने अपनी सिफारिशें किंचित व्यावहारिक सीमाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की हैं।


    इसीलिए उन्होंने सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून की भी सिर्फ समीक्षा की सिफारिश की है, जबकि कई हलकों को यह उम्मीद थी कि वे इसे जम्मू-कश्मीर से वापस लिए जाने का सुझाव देंगे। वार्ताकारों ने कहा है कि धारा 370 की भावना के उलट संविधान के जिन अनुच्छेदों, कानूनों या आदेशों को अतीत में कश्मीर में लागू किया गया, उनकी समीक्षा के लिए एक संवैधानिक समिति बनाई जाए।



    भविष्य में सिर्फ वे अनुच्छेद या कानून ही वहां लागू रहें, जिनकी सिफारिश प्रस्तावित संवैधानिक समिति करे और जिन्हें संसद एवं जम्मू-कश्मीर विधानसभा अनुमोदित करें। भविष्य में विधानसभा के अनुमोदन के बाद ही कोई केंद्रीय कानून राज्य में लागू हो। यानी 1953 से पहले की स्थिति बहाल करने की मांग को वार्ताकारों ने व्यावहारिक नहीं माना है।


    बहरहाल, वार्ताकारों की राय अंतिम नहीं है, लेकिन बतौर सुझाव एवं कश्मीर के लोगों की शिकायतों को दूर करने के लिहाज से यह गौरतलब है। इसलिए सभी पक्ष इस रिपोर्ट पर गौर कर सकते हैं।

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  2. http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/05/120529_khurshid_reservation_muslim_vd.shtml

    अल्पसंख्यक आरक्षण:सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी
    मंगलवार, 29 मई, 2012 को 16:52 IST तक के समाचार

    सरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी

    केंद्रीय कानून और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि सरकार आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देगी जिसने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था को खारिज कर दिया था.

    दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में खुर्शीद ने कहा कि फैसले को चुनौती देते हुए सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर करेगी.

    इससे पहले सोमवार को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था करने की केंद्र सरकार की कोशिशों को निरस्त कर दिया था.

    केंद्र सरकार ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए मौजूदा 27 प्रतिशत के आरक्षण कोटे के तहत धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी जिनमें सबसे बड़ी संख्या मुसलमानों की है.

    लेकिन समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति पीवी संजय कुमार की खंडपीठ ने कहा, "इस तरह का कदम उठाए जाने के लिए कोई तार्किक या अनुभव आधारित आंकड़े मौजूद नहीं हैं."

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  3. http://timesofindia.indiatimes.com/india/Govt-yet-to-take-a-view-on-JK-interlocutors-report-Chidambaram/articleshow/13695302.cms

    Govt yet to take a view on J&K interlocutors' report: Chidambaram
    TNN | Jun 1, 2012, 02.53AM IST

    NEW DELHI: Seeking an "informed debate" on the Jammu and Kashmir interlocutors' report, home minister P Chidambaram on Thursday said the government will take a view on it including the recommendation on setting up of a constitutional committee only after looking at its "pros and cons" at a later stage.

    "The government has not taken a view," he said when asked whether the government will accept the interlocutors' recommendations for setting up a constitutional committee to review all central Acts and Articles of the Constitution extended to the state after 1952.

    The home minister said it was not appropriate for him to express his personal views on the issue when the government was yet to consider it.

    Expressing hope that an informed debate will take place on the report which should include the political parties, Chidambaram said, "Each one of us is a prisoner of the past. We should release ourselves from the past and genuinely participate in the debate. When the debate takes place, I am sure, different views will be expressed on the proposal to constitute a constitutional committee and let us look at the pros and cons of the report."

    Asked whether it would be a structured debate, the home minister said the interlocutors had offered to act as "resource persons" to facilitate the debate. "So, I think over the next couple of months, there will be a few workshops around the country where the interlocutors will be available as resource persons," he said.

    Indicating that an all-party meeting may be called to discuss the report at a later stage, Chidambaram said, "It is also my view that at some point of time, we should call the all-party meeting which gave rise to the appointment of the interlocutors... Meanwhile, I think the political parties will also discuss the report and come up with their views.

    "This is an important matter and I think we should approach it with a great degree of seriousness so that there is a genuine and informed debate on the subject."

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